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पत्रकारिता का कर्तव्य


आम धारणा बन गई है कि राष्ट्रीय उन्नयन-पथ को भारतीय मीडिया बाधित अधिक और प्रशस्त कम करती रही है ।स्वातंत्र्योत्तर भारत में यह अर्धसत्य तो है अर्थात पूरा झूठ भी नहीं है।मगर स्वाधीनता आंदोलन में एकाध संपादक अथवा पत्रिका को छोड़कर सभी ने देश को उन्नत (स्वंत्रत)बनाने में अकूत योगदान किया है। हां मीडिया की भूमिका स्वाधीन देश में नकारात्मक ज्यादा रही खासकर आज की चैनल मीडिया।
            समाचार पत्र उद्योग के ढाई सदी के इतिहास का विहंगावलोकन करें,तो प्रिंट मीडिया दो भागों में बांटा दिखता है।यह विभाजन भी नस्ल और रंग के कारण हुआ था, मगर एक और बर्ग भी रहा,जहां यूरोपीय संपादकों ने भारतीय मुक्ति अभियान का दिल से,अपनी कलम से समर्थन किया।यह खेमा छोटा,मगर प्रभावी रहा।जेम्स सिल्क बकिंघम कि 'कोलकाता जर्नल' से सफर शुरू कर बी0जी0हर्निमन के 'बाम्बे क्रॉनिकल'तक चले,तो उन गोरे पत्रकारों की याद में भारतीयों का सिर अनायास नत हो जाता है।ये लोग जेल गए और भारत से निष्कासित भी हुए।
                 टाइम्स ऑफ इंडिया के सर फ्रांसिस लो की दृष्टि दूर तक की थी।उनका मानना था कि भारत का आर्थिक विकास त्वरित हो।साथ में राजनैतिक स्वालंबन की दिशा में भी प्रगति निश्चित रफ्तार से हो,किंतु तब तक उनके हमवतन अंग्रेज भारत पर शासन करते रहे, इसकी तुलना में 'दि पायोनियर' के डेसमंड यंग तो भारत के ब्रिटिश राज के सूर्य को सदैव चमकता देखना चाहते थे। अंग्रेजी राज का सूरज तो समंदर में गोता लगा गया, उसका 'पायोनियर' भी डूबता-उतराता अब एक वरिष्ठ नेता की मदद से किनारे लग गया, बच गया।
          भारतीय संपादकों का उल्लेख किया जाए, तो भारत के विभाजन को  राष्ट्रोन्नयन में घातक साबित करने के आंदोलन में कराची (सिंध) के पत्र-पत्रिकाओं और सम्पादकों की भूमिका अदम्यऔर अद्भुत रही। साधु टी0एल0वासवानी की 'न्यू टाइम्स' की विशेष चर्चा करनी होगी। साधु वासवानी ने अपने मातृप्रदेश के गौरवशाली इतिहास को आत्मसात किया था। उन्होंने दूसरे सिंधी मोहम्मद अली जिन्ना के विघटनकारी प्रवृत्ति से टक्कर ली।
         साधु वासवानी ने महाराजा दाहिर और उनसे भी पूर्व मोहनजोदड़ो से सिन्ध की सिलसिलेवार प्रगति का अपने लेखों में उल्लेख किया था। बर्बर,असभ्य और आताताई मोहम्मद बिन कासिम द्वारा फलती-फूलती सभ्यता के विनाश और पाश्विक,जघन्य, अरब साम्राज्यवादी लिप्सा के हद पार करने को चित्रित कर 'न्यू टाईम्स' के स्तंभों द्वारा सिंधियों को सचेत किया था कि धर्म नही,वरन जाति पर राष्ट्रीयता आधारित होती हैं।
           आज जिए सिंध आंदोलन के प्रणेता पंजाब के इस्लामी आततायियो से मुक्ति चाहते हैं। उसी प्रकार जैसे बलूच और पश्तून इस्लामाबाद से स्वतंत्र होने के लिए संघर्षरत हैं। विडंबना है कि इस्लामी गणराज्य की सशस्त्र सेना मुस्लिम औरतों और बच्चों पर बम बरसा रही है, ताकि 'निजाम ए मुस्तफा' कायम रह सके साधु वासवानी ने नौ दशक पूर्व इस ऐतिहासिक आपदा की चेतावनी 'न्यू टाईम्स'में दे दी थी। एक अन्य दैनिक, जिसने सिन्ध प्रदेश को भारत की बाईं भुजा बने रहने में सतत संघर्ष किया,उसका नाम था 'सिंध ऑब्जर्वर'उसके संपादक थे स्वर्गीय कोटमराजू पुन्नय्या,जो तेलुगू भाषी थे।चिराला के नियोगी ब्राम्हण परिवार में जन्मे,संस्कृत पंडित कोटमराजू नारायण राव के पुत्र श्री पुन्नय्या आधुनिक सिन्ध प्रदेश के शिल्पी माने जाते हैं। उनकी स्मृति में निर्मित पुन्नय्या पुरी आज भी कराची में है। मुस्लिमलीगियो ने तनिक लिहाज तो रखा है।बॉम्बे प्रेसीडेंसी, जिसका सिन्ध एक भाग था,ने तो राष्ट्रोंन्नयन में अपना योगदान किया। सामाजिक चेतना को गढ़ने उभारने और प्रखर बनाने के आंदोलन में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के 'केसरी' तथा 'मराठा' का योगदान अनन्य रहा।एक फर्क रहा कि तिलक ने सामाजिक उत्थान के पूर्व राजनीतिक विकास पर बल दिया।
         बंगाल ही के "अमृत बाजार पत्रिका"तथा "जुगांतर" के मोतीलाल घोष का प्रभाव तिलक पर अत्यधिक पड़ा।बंगाल में राजा राम मोहन राय आदि ने अपनी पत्रिकाओं द्वारा सामाजिक उन्नयन का अभियान किया।जब पत्रिका "वंदे मातरम" महर्षि अरविंद की संपादकत्व में प्रकाशित हुई, तो फिर राजनीतिक चेतना पर अधिक बल दिया गया।मद्रास के 'दि हिंदू' तथा लाहौर के 'दि ट्रिब्यून' का भी उल्लेख आवश्यक है।
                 इस बीच संयुक्त प्रांत में हिंदी पत्रकारिता के साथ आंग्ल भाषा की मीडिया भी राष्ट्रहित और ब्रिटिश समर्थन की भूमिका में उभरी।प्रदेश की आर्थिक प्रगति के क्षेत्र में दो भारतीय पत्रकारों का कार्य श्लाघ्य रहा। लखनऊ की पत्रिका "हिंदुस्तान" का प्रकाशन कर विधायक बाबू गंगा प्रसाद वर्मा ने नगर के जन जीवन को सार्थक और सुविधा पूर्ण बनाने की कई योजनाएं चलाई। उधर इलाहाबाद में पंडित मदन मोहन मालवीय से जुड़ा 'दि लीडर' दशकों से प्रयाग और पूर्वांचल के क्रमिक विकास में तत्पर रहा।
            संपादक सी0वाई0चिंतामणि तेलुगू भाषी आंध्र प्रदेश से इलाहाबाद आए थे। उन्होंने अपने संपादकीय और विधान परिषद में भाषणों द्वारा प्रदेश विकास को दिशा दी,मगर उन्हें इलाहाबाद की उपेक्षा का गम रहा,जब अंग्रेजी राज ने संयुक्त प्रांत की राजधानी को इलाहाबाद से लखनऊ स्थानांतरण किया तो "दि लीडर"ने जबरदस्त अभियान चलाया। मगर वह सफल ना हो सका।
            इस मुद्दे पर अंतिम संपादकीय चिंतामणि ने लिखा था कि अंग्रेज सारी संस्थाओं को यहां तक कि उच्च न्यायालय और यह ए0जी0कार्यालय को भी लखनऊ ले आए,पर क्या आप हमारे संगम को लखनऊ ले जा पाएंगे? राजधानी खत्म होने से इलाहाबाद का विकास दशकों तक थम गया। उधर लखनऊ में जब मुस्लिम लीग को परास्त कर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेश ने 1937 में सरकार गठित की तो पंडित नेहरू की अध्यक्षता में 'एसोसिएटेड जर्नल्स' की स्थापना हुई। आचार्य नरेंद्र देव, डॉ0संपूर्णानंद, चंद्रभान गुप्त की सदस्यता से "नेशनल हेराल्ड" दैनिक प्रकाशित हुआ।इसके संस्थापक संपादक थे स्वर्गीय श्री के0रामा राव,जो कराची के दैनिक "सिन्ध आब्जर्वर" के संपादक श्री कोटमराजू पुन्नय्या के कनिष्ठ भ्राता थे।
              नेशनल हेराल्ड की पहचान लखनऊ के इतिहास से उतनी ही गाढ़ी है,जितनी बेली गारद की है। अंग्रेजी राज के लिए शूल बने नेशनल हेराल्ड के संपादक एम0चलपति राव ने रामा राव के कार्य को बढ़ाया।उसी दौर में सच्चिदानंद सिन्हा के दैनिक "दि सर्चलाइट"ने पटना में सामयिक उन्नति हेतु अभियान किया था। गांधी जी की पत्रिकाओं (हरिजन तथा यंग इंडिया) की भूमिका सर्वविदित रही।
        अब आई बात उस मीडिया की, जिसने स्वातंत्र्योत्तर भारत में राष्ट्र जीवन में भूमिका निर्वाह की और कर रही है।प्रिंट मीडिया की दृष्टि में क्रांतिकारी परिवर्तन आया। नए भारत में लक्ष्य भी बदला,दिशा भी भिन्न थी,और कार्यशैली नई रचित हुई।पराधीन भारत की मीडिया की तुलना में आज की मीडिया में दो कमियां अखरती हैं।
पहली है आदर्शवादिता का अभाव तथा दूसरा है राष्ट्र के लिए प्रतिबद्धता का ढीला-ढाला रूप। हालाँकि सदियों पूर्व बृहदारण्यक उपनिषद (2/4/5)में उल्लिखित है "आत्मनस्तु कामाय सर्व प्रिय भवति" अर्थात मनुष्य को अपने लिए ही,अपने स्वार्थ के लिए ही सबकुछ प्रिय होता है।शायद इसी कसौटी पर आज की प्रिंट और चैनल मीडिया को परखे,तो उपनिषद की यह चेतावनी सही दिखती है।
        आमतौर पर पत्र-पत्रिकाओं,विशेषकर भारतीय भाषाई समाचार-पत्रों, ने राष्ट्र उन्नयन की भूमिका निबाही है, किंतु शुभ-लाभ के लोभ से वे बच नहीं पाए, हालांकि तेलगु,बांग्ला और गुजराती समाचार-पत्र,सामाजिक समस्याओं से जूझते रहे।
        हिंदी पत्रकारिता में दो स्पष्ट खेमें दिखें आंचलिक और जनपदीय प्रकाशन,जैसी लघु और मझोले अखबार राजनैतिक और जनपदीय मुद्दे उठाते हैं,पर उनकी पहुंच सीमित है।पाठक भी कुछ परिधि के भीतर ही रहते हैं,जिन समाचार पत्रों का विस्तार बड़ा है, फैलाव है,उनकी सोच उतनी व्यापक नहीं रही।फिर विज्ञापन को समाचार और आलेख के अनुपात में अधिक स्थान और महत्व दिया जा रहा है।इससे समाजोत्थान का उद्देश्य कमजोर पड़ रहा है।
               उदाहरणार्थ भ्रष्टाचार के विरुद्ध संग्राम में लचीलापन ज्यादा आ गया है।'घूस का घूसा' के नाम से कुछ दैनिक पत्रों ने आंदोलन किया, पर वह कुछ समय तक ही रहा। एक विश्व सर्वेक्षण के अनुसार यदि भारत, जो भ्रष्टाचार में अग्रणी है,तर्कसम्मत आर्थिक ईमानदारी हासिल कर ले,तो वह विकसित राष्ट्रों से नीचे नहीं रहेगा।
                एक व्यथित कर देने वाली बात है कि आज चैनल मीडिया को देखकर लगता है कि राष्ट्रीय विकाश से उसे कुछ भी लेना-देना नहीं है।सर्वोच्च न्यायालय तक ने कह दिया था कि भ्रष्टाचार को उजागर करने वाले स्टिंग ऑपरेशन से चैनल मीडिया धन बटोर रहा है,लाभ संचित कर रहा है,कोई सामाजिक हित नहीं कर रहा है।अतः स्थिति स्पष्ट है कि चैनल मीडिया हेतू नियामक समिति बने,जो उसे राष्ट्रहित और देशोत्तथान में संलिप्त करे।यदि ऐसा नही हुआ, तो फिर मीडिया बनाम राष्ट्रहित जैसा नजारा उभरेगा।यह पत्रकारिता को कुरूप तो बनायेगा, साथ ही राष्ट्रोंन्नयन की धारा के प्रवाह को भी बाधित करेगा।यह उन दोनों के लिये घातक होगा।
    
           ।।इति शुभम।।



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