आयुर्वेदिक डॉक्टर भी जल्द लिख सकेंगे अंग्रेजी दवाएं, फरमान सुनते ही मची खलबली....


देशभर में आयुर्वेदिक डॉक्टरों द्वारा एलोपैथिक दवाएं लिखने की राह साफ होती नजर आ रही है। 

दरअसल राज्यसभा में राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा पद्धति आयोग विधेयक पेश किया गया है जिसमें यह कहा गया है कि राज्य सरकारों को यह अधिकार दिया जाता है कि वह एक कानून के तहत आयुर्वेदिक डॉक्टरों को एलोपैथिक दवाएं लिखने की अनुमति दे सकती हैं। हालांकि इस विधेयक को फिलहाल राज्यसभा में पेश किया गया है। 

राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा पद्धति आयोग 

यहां से पास होने के बाद यह लोकसभा में जाएगा और फिर यदि वहां पास हो जाता है तो राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद इसे लागू कर दिया जाएगा। वैद्य बिरादरी में खुशी की लहर : इस पूरे मामले को लेकर इंटिग्रेटिड मेडिकल एसोसिएशन के एक प्रतिनिधिमंडल ने भाजपा नेता अनूप यादव के नेतृत्व में केंद्रीय स्वास्य मंत्री जेपी नड्डा से मुलाकात की। 

इस बारे में बात करते हुए एसोसिएशन के नेशनल प्रेसिडेंट डा. नरेश छावनिया ने बताया कि अभी तक भारतीय चिकित्सा पद्धतियों का नियमन केंद्रीय भारतीय चिकित्सा परिषद अधिनियम 1970 के अंतर्गत होता है। 

यदि यह विधेयक पारित हो जाता है तो यह 1970 के अधिनियम का स्थान ले लेगा। 1970 के अधिनियम में राज्य सरकारों को यह अधिकार दिया गया है कि वह अपने राज्यों में पंजीकृत भारतीय चिकित्सा पद्धतियों के डॉक्टरों को एलोपैथिक दवाओं के प्रयोग का अधिकार दे सकती हैं लेकिन दो साल पहले नीति आयोग द्वारा प्रस्तावित विधेयक में इस प्रावधान को नहीं रखा गया था।

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वहीं इस बारे में एसोसिएशन के महासचिव डा. आरपी पराशर कहते हैं कि एलोपैथिक दवाओं के प्रयोग के अधिकार से संबंधित प्रावधान को विधेयक में जुड़वाने सहित अन्य विवादास्पद मुद्दों पर एसोसिएशन लगभग दो साल से देश भर में आंदोलन कर रही थी।

नवंबर 2017 में अन्य संगठनों के साथ मिलकर एसोसिएशन ने टाऊन हॉल से लेकर राजघाट तक धरने-प्रदर्शन और रैली का आयोजन किया था जिसमें देश भर से आए चिकित्सकों ने भाग लिया था। आईएमए में लीगल सेल के चेयरमैन डा. रामफल पंचाल मुताबिक आयोग के अंतर्गत आयुर्वेद के लिए अलग बोर्ड का भी गठन किया गया है। 

उनका कहना है कि आयोग के गठन में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को ताक पर रखने के फैसले पर सरकार को पुनर्विचार करना चाहिए।



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