यू ही नहीं कहा गया है महादेवी वर्मा को आधुनिक युग की मीरा ,रचनाएं में दिखती है झलक

हिंदी साहित्य में अपना असीम योगदान देने में महिलाएं भी कभी पीछे नहीं रही हैं . इतिहास से लेकर वर्तमान समय में भी महिलाएं हिंदी साहित्य में अपना योगदान स्वर्णिम अक्षरों में लिख रही है. एक नाम हमने अपनी हिंदी काव्य की किताबों में खूब पढ़ा है वो है महादेवी वर्मा . हिंदी के साथ महादेवी वर्मा का नाम सदियों तक याद किया जाएगा. काव्य जगत में महादेवी वर्मा किसी परिचय की मोहताज नहीं. महादेवी वर्मा को आधुनिक युग की मीरा नाम से संबोधित किया जाता था. आप सब को यह जानकर हैरानी होगी की महादेवी जी सात वर्ष की उम्र से कविता लिखती थी. यही कारण है कि उनकी कविता इतनी प्रसिद्ध होती है. आखिर हो भी क्यों न महादेवी कविता में इतनी शक्ति होती की उनके पाठक डूबकी‌ लगा ही लेते हैं और कविता में डूबकर बिल्कुल गहराई तक चले जाते हैं.महादेवी जी ने अपनी करूण कोमल कविता से ही साहित्य में प्रवेश किया था. ‘अतीत के चलचित्र’ उनकी प्रथम गद्य पुस्तक है. रचना चाहे गद्य की हो या पद्य की उसमें साहित्यकार के व्यक्तित्व का भाव अवश्य होता है. साहित्यकार जो कुछ भी लिखता है उस पर उसके अनुभवों , विचारों तथा मनोभावों का छाप उसी प्रकार ही रहता है, जिस तरह वस्तु की स्थिति के साथ उसकी छाया. छायावाद के चार प्रमुख स्तंभ में से एक स्तंभ महादेवी जी भी है जिन्होंने साहित्य को एक नया रूप भी प्रदान किया था. जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पंत की तरह छायावाद में महादेवी जी ने मूल बात की प्रतिष्ठा की थी वह थी काव्यों में जान डाला था.महादेवी जी की एक विशिष्टता यह थी कि उन्होंने कभी भी कल्पना का सहारा नहीं लिया. उन्होंने हमेशा सत्य घटनाओं का सहारा लेकर ही रेखाचित्र, संस्मरण, ललित निबंध लिखा है. उनके इस विशेषता के कारण ही वह अपने पाठकों की चहेती बनी. पढ़िए महादेवी वर्मा की कुछ चुनिदा रचनाएं –

 

मै अनंत पथ में लिखती जो

मै अनंत पथ में लिखती जो

सस्मित सपनों की बाते

उनको कभी न धो पायेंगी

अपने आँसू से रातें!

 

उड़् उड़ कर जो धूल करेगी

मेघों का नभ में अभिषेक

अमिट रहेगी उसके अंचल-

में मेरी पीड़ा की रेख!

 

तारों में प्रतिबिम्बित हो

मुस्कायेंगी अनंत आँखें,

हो कर सीमाहीन, शून्य में

मँडरायेगी अभिलाषें!

 

वीणा होगी मूक बजाने-

वाला होगा अंतर्धान,

विस्मृति के चरणों पर आ कर

लौटेंगे सौ सौ निर्वाण!

 

जब असीम से हो जायेगा

मेरी लघु सीमा का मेल,

देखोगे तुम देव! अमरता

खेलेगी मिटने का खेल!

 

 

जग अपना भाता है

जग अपना भाता है !

मुझे प्रिय पथ अपना भाता है ।

नयनों ने उर को कब देखा,

हृदय न जाना दृग का लेखा,

आग एक में और दूसरा सागर ढुल जाता है !

धुला यह वह निखरा आता है !

और कहेंगे मुक्ति कहानी,

मैंने धूलि व्यथा भर जानी,

हर कण को छू प्राण पुलक-बंधन में बंध जाता है ।

मिलन उत्सव बन क्षण आता है !

मुझे प्रिय जग अपना भाता है !

 

 

 

स्वप्न

 इन हीरक से तारों को

कर चूर बनाया प्याला,

पीड़ा का सार मिलाकर

प्राणों का आसव ढाला।

 

मलयानिल के झोंको से

अपना उपहार लपेटे,

मैं सूने तट पर आयी

बिखरे उद्गार समेटे।

 

काले रजनी अंचल में

लिपटीं लहरें सोती थीं,

मधु मानस का बरसाती

वारिदमाला रोती थी

 

 

 

आह्वान -  महादेवी वर्मा

फूलों का गीला सौरभ पी

बेसुध सा हो मन्द समीर,

भेद रहे हों नैश तिमिर को

मेघों के बूँदों के तीर।

नीलम-मन्दिर की हीरक—

प्रतिमा सी हो चपला निस्पन्द,

सजल इन्दुमणि से जुगनू

बरसाते हों छबि का मकरन्द।

बुदबुद को लड़ियों में गूंथा

फैला श्यामल केश-कलाप,

सेतु बांधती हो सरिता सुन—

सुन चकवी का मूक विलाप।

तब रहस्यमय चितवन से-

छू चौंका देना मेरे प्राण,

ज्यों असीम सागर करता है

भूले नाविक का आह्वान

 

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