माघ मेले में विवाद: जानें शंकराचार्य पद क्या है और कौन थे सनातन धर्म के पहले शंकराचार्य-

 

माघ मेले में विवाद: जानें शंकराचार्य पद क्या है और कौन थे सनातन धर्म के पहले शंकराचार्य-

प्रयागराज: माघ मेले के बीच शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और मेला प्रशासन के बीच मौनी अमावस्या के स्नान को लेकर विवाद चल रहा है। इसी विवाद के कारण शंकराचार्य के पद को लेकर सवाल भी उठने लगे हैं। लोग जानना चाहते हैं कि शंकराचार्य कौन होते हैं और यह पद कैसे मिलता है।

सनातन धर्म में शंकराचार्य का पद सर्वोच्च माना जाता है। किसी मठ में मौजूद सबसे विद्वान और वेदों का गहरा ज्ञान रखने वाले संत को यह उपाधि दी जाती है। भारत में चार प्रमुख मठ हैं – ज्योतिर्मठ (उत्तराखंड), शारदा मठ (गुजरात), गोवर्धन मठ (पुरी, ओडिशा) और शृंगेरी मठ (कर्नाटक)। इन मठों के सर्वोच्च पद को ही शंकराचार्य कहा जाता है।

सनातन धर्म के पहले शंकराचार्य आदि गुरु शंकराचार्य थे। उन्होंने चारों दिशाओं में मठों की स्थापना की और अपने चार शिष्यों को धर्म के प्रचार और प्रसार की जिम्मेदारी सौंपी। इसी से शंकराचार्य परंपरा की शुरुआत हुई, जो आज तक जारी है।

शंकराचार्य बनने के लिए संन्यासियों को गृहस्थ जीवन का त्याग, पिंडदान और वेद-उपनिषदों का गहरा ज्ञान होना अनिवार्य है। पद के लिए गुरु-शिष्य परंपरा का पालन किया जाता है। मठ का वर्तमान शंकराचार्य अपने सबसे योग्य शिष्य को चयनित करता है और काशी विद्वत परिषद तथा संत सभा की मंजूरी मिलने के बाद उपाधि दी जाती है।

वर्तमान में देश के चार शंकराचार्य इस प्रकार हैं:

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती, ज्योतिर्मठ (उत्तराखंड)
निश्चलानंद सरस्वती, गोवर्धन मठ (ओडिशा)
सदानंद सरस्वती, शारदा मठ (गुजरात)
जगद्गुरु भारती तीर्थ, शृंगेरी मठ (कर्नाटक)

माघ मेले में चल रहे विवाद और पद को लेकर बहस के बीच यह पद सनातन धर्म में अपनी परंपरा और धार्मिक महत्व के कारण हमेशा चर्चा में रहता है।

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