चुनाव के तारीख का ऐलान, क्या विस चुनाव बनेगी तिसरे लहर की वजह? कौन होगा जिम्मेदार?

Allowancement of election in 5 states of India: कोरोना संक्रमण काल के दौरान ही यूपी समेत 5 राज्यों चुनाव कराने को लेकर चुनाव आयोग ने तारीखों का ऐलान कर दिया है. 10 फरवरी से यूपी में पहले चरण के मतदान कराए जाएंगे. जिसके लिए 14 जनवरी को अधिसूचना और 21 जनवरी को नामांकन की आखिरी तारीख होगी. जाहिर सी बात है कि नेता अब जनसंपर्क भी तेज करेंगे. इस लिए सवाल उठता है कि क्या यह चुनाव तिसरे लहर की वजह बनने वाली है? और अगर ऐसा होता है तो इसका जिम्मेदार कौन होगा?

पिछले दिनों बढ़ते संक्रमण ने कितनों के रोजगार छिन लिए. कितने परिवार अनाथ हो गए. लेकिन कोरोना से प्रभावित जनता की हालत से नेताओं को क्या लेना देना. इन्हें तो चुनाव लड़ना ही है...जितनी जल्दी नतिजे घोषित होगें.धौंस जमाने वाले लाइसेंस के परमिट की बैधता उतनी ही जल्दी मिल जाएगी...इसी छटपटाहट में नेता जी लोग लगे हैं.

खतरा से खाली नहीं है ये चुनाव

यूपी समेत 5 राज्यों में विधानसभा के कार्यकाल पूरे होने वाले हैं.ऐसे में इन राज्यों में चुनाव होना लाजमी है...लेकिन कोविड संक्रमण के बढ़ते मामलों के बीच चुनाव कराना भी खतरे खाली नहीं है.इस दशा में चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों को भी चुनाव टालने पर विचार करनी चाहिए. जिस संविधान में चुनाव कराने का प्रावधान हैं. उसी संविधान में नागरिकों के प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण का भी प्रावधान है. अनुच्धेद 21 में दिया गया यह ऐसा अधिकार है जिसे आपातकाल की स्थिति में छिना नहीं जा सकता और न ही इसे नजरअंदाज किया जा सकता है.

आखिर क्यों नही टल सकता चुनाव?..

रही बात चुनाव की तो आपात परिस्थितियों में चुनाव आयोग को यह शक्ति है कि वह चुनाव को टाल सके. लेकिन वर्तमान राजनीति कि रस्म को देखकर चुनाव आयोग भी दंग है. शायद, उसे भी इस बात का डर है कि अगर चुनाव टलती है तो उसपर सत्ता पक्ष के साथ संबन्ध होने का आरोप लगेगा. और विपक्ष के लोग इसे भी चुनावी मुद्दा बनाने से नहीं चुकेंगे.

वैसे कोविड के दूसरे लहर के दौरान चुनाव आयोग को अपने गलतियों का अहसास भी हो चुका है. पश्चिम बंगाल और तामिलनाडू समेत 5 राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान उन्हे मद्रास हाईकोर्ट में तलब भी होना पड़ा था. इनसब को लेकर चुनाव आयोग ने इसबार पूरी तैयारी कर ली है. वह ज्यादा रिस्क लेना नहीं चाहती वह प्रदेश के स्वास्थ महकमें और अन्य विभागों से परिस्थियों का जायजा लेते हुए चुनाव कराने की तैयारी कर रही है.

चुनाव को समय पर ही कराने के पक्ष में राजनीतिक दलों के तरफ से भी दबाव बनाए जा रहे हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जब चुनाव टालने पर विचार करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी और चुनाव आयोग से अपील की थी. तो राजनीतिक महकमें में जमकर विरोध हुए थे. यूपी के मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के सांसद और पार्टी सुप्रिमो अखिलेश यादव के चाचा रामगोपाल ने इस पर जोरदार सवाल उठाया था.

नेता और अधिकारियों के बल्ले-बल्ले, कहर तो जनता पर..

अब बात साफ है. चाहे वह चुनाव आयोग हो या राजनीतिक दल. सभी ने चुनाव कराने का मन बना लिया है. अगर इस दौरान संक्रमण बढ़ता है तो उसके लिए भी उनकी तैयारियां साथ साथ चल रही हैं. जिससे परिस्थिति खराब होने के बाद भी वो अपना ठिकड़ा किसी दूसरे पर फोड़ सके. स्थिति खराब होने की जिम्मेदारी न नेता लेंगे न चुनाव आयोग. और न ही राज्य की कोई एजेंसिया. लेकिन इसी के बदौलत नेताओं को राजनीतिक रंगमंच मिल जाएगा. जिसपर वे एक-दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप का नाकट करते दिखेंगे.

चुनाव के दौरान चरम पर होगा संक्रमण

आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर मनिद्र अग्रवाल के अनुसार,  आने वाले एक महिने के दौरान कोविड मामले में तेजी से बढ़ोतरी होने वाली है. केन्द्रीय स्वस्थ मंत्रालय के सुंयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने भी यह जानकारी दी है कि आने वाले वाले 25 दिनों में कोविड संक्रमण अपने चरम पर होगा. ऐसे में चुनाव कोराना खतरे से खाली नहीं हो सकता.

जिम्मेदार आखिर कौन?

फिलहाल चुनाव आयोग ने पांच राज्यों में होने वाले चुनाव की तारीखों का ऐलान भी कर दिया है.10 फरवरी से पहले चरण के चुनाव कराए जाने हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इस चुनाव को संक्रमण का स्तर कम होने तक टाला नहीं जा सकता? जब संक्रमण अपने पीक पर होगा उस दौरान चुनाव कराने का निर्णय क्यों लिया जा रहा हैं? इस दौरान होने वाले खतरे के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाएगा? क्या लोगों के जान से बड़ा मसला चुनाव कराने का हो गया है?.

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