पोंगल है आस्‍था और समृद्धि का संगम, जानें इस पर्व से जुड़ी सभी जरूरी बातें

गुड़ तिल के लड्डू और हाथों में पतंग

खुशी और उल्लास के साथ मनाएं पोंगल

दक्षिण भारत में मनाए जाने वाले महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक त्योहार है पोंगल. पोंगल का त्योहार तमिल महीने ‘तइ’ की पहली तारीख से शुरू होता है. इस त्योहार को 14 जनवरी से 17 जनवरी यानि 4 दिनों तक मनाते हैं. मुख्य त्योहार पौष माह की प्रतिपदा को मनाया जाता है. दक्षिण भारत के किसान पोंगल का त्योहार फसल के पक जाने और नई फसल के आने की खुशी में मनाते हैं, साथ ही यह त्योहार संपन्नता को समर्पित किया जाता है. पोंगल पर समृद्धि लाने के लिए वर्षा, सूर्य देव, इंद्रदेव और मवेशियों को पूजने की परम्परा लम्बे समय से चली आ रही है.

मान्यता के मुताबिक पौंगल पर्व का आरंभ 200 से 300 ईस्वी ईशा पूर्व का माना जाता है. उन दिनों द्रविण शस्य उत्सव के रूप में इस पर्व को मनाया जाता था. तिरुवल्लुर के मंदिर में प्राप्त शिलालेख में लिखा गया है की किलूटूँगा राजा पौंगल के अवसर पर जमीन और मंदिर गरीबों को दान में दिया करते थे. ऐसा भी माना गया है कि उस दौर में जो व्यक्ति सबसे ज्यादा  शक्तिशाली होता था उसे 'पोंगल' पर्व, के दिन कन्याएं वरमाला डालकर अपना पति चुनती थी.आज की इस कड़ी में हम पोंगल की पौराणिक कथाओं के बारे में जानेंगे.

पोंगल से जुड़ी कथा -

पोंगल पर्व भगवान शिव से संबंद्ध है.मट्टू भगवान शंकर का बैल है जिसे एक भूल के कारण भगवान शंकर ने  पृथ्वी पर भेज दिया और कहा कि वह मानव जाति के लिए अन्न पैदा करे. तब से मट्टू पृथ्वी पर रह कर कृषि कार्य में सहायता कर रहा है. इस दिन किसान अपने बैलों को स्नान कराते है. उनकी सींगों में तेल लगाते है. और अन्य प्रकार से उनकी पूजा करते है. बैलों के साथ साथ इस दिन गाय और बझड़ो की भी पूजा की जाती है.

काली पूजन से जुड़ी कथा -

मदुरै के पति-पत्नी कण्णगी और कोवलन से जुड़ी है. एक बार कण्णगी के कहने पर कोवलन पायल बेचने के लिए सुनार के पास गया.  सुनार ने राजा को बताया कि जो पायल कोवलन बेचने आया है वह रानी के चोरी गए पायल से मिलते जुलते हैं.

राजा ने इस अपराध के लिए बिना किसी जांच के कोवलन को फांसी की सजा दे दी. इससे क्रोधित होकर कण्णगी ने शिव जी की भारी तपस्या की और उनसे राजा के साथ-साथ उसके राज्य को नष्ट करने का वरदान मांगा. जब राज्य की जनता को यह पता चला तो वहां की महिलाओं ने मिलकर किलिल्यार नदी के किनारे काली माता की आराधना की. अपने राजा के जीवन एवं राज्य की रक्षा के लिए कण्णगी में दया जगाने की प्रार्थना की. माता काली ने महिलाओं के व्रत से प्रसन्न होकर कण्णगी में दया का भाव जाग्रत किया और राजा व राज्य की रक्षा की. तब से काली मंदिर में यह पर्व  धूमधाम से मनाया जाता है. इस तरह चार दिनों के पोंगल का समापन होता है.

पोंगल में भगवान सूर्यदेव को लगने वाला भोग/ पोंगल के पकवान

इस दिन विशेष तौर पर खीर बनाई जाती है. पोंगल त्यौहार वाले दिन सदियों से चली आ रही परंपरा और रिवाजों के अनुसार तमिलनाडु राज्य के लोग दूध से भरे एक बर्तन को ईख, हल्दी और अदरक के पत्तों को धागे से सिलकर बांधते हैं और उसे प्रज्वलित अग्नि में गर्म करते हैं और उसमें चावल डालकर खीर बनाते हैं, जो पोंगल कहलाता है और फिर उसी का भोग सूर्यदेव को लगाया जाता है. इसके अलावा इस दिन मिठाई और मसालेदार पोंगल व्यंजन तैयार किये जाते हैं.

तमिलनाडु में पोंगल -

पोंगल पर्व में दक्षिण भारत के लोग फसल समेटने के बाद अपनी खुशी प्रकट करने के साथ ही आने वाली फसल के अच्छे होने की प्रार्थना करते हैं. इस दिन लोग धूप, सूर्य, इन्द्रदेव और पशुओं की पूजा कर उनका आभार प्रकट करते हैं. तमिलनाडू में पोंगल पर्व को पूरे चार दिनों तक मनाया जाता है. अलग अलग दिन को अलग अलग नामों से जाना जाता है. इस पर्व का पहला दिन भोगी पोंगल, दूसरा दिन सूर्य पोंगल, तीसरा दिन मट्टू पोंगल और चौथा दिन कन्या पोंगल कहलाता है, दिनों के हिसाब से ही पूजा की जाती है.

  • पहले दिन भोगी पोंगल में घरों की साफ-सफाई की जाती है और सफाई से निकले पुराने सामानों से ‘भोगी’ जलाई जाती है और इस दिन इन्द्रदेव की पूजा होती है.
  • दूसरे दिन यानी सूर्य पोंगल पर सूर्यदेव की पूजा होती है. लोग अपने-अपने घरों में मीठे पकवान चकरई पोंगल बनाते हैं और सूर्य देवता को भोग लगाते है.
  • तीसरे दिन को मट्टू अर्थात नंदी या बैल की पूजा की जाती है. लोग जीविकोपार्जन में सहायक पशुओं के प्रति आभार व्यक्त करते हैं, गाय-बैलों को सजाते हैं, महिलाएं पक्षियों को रंगे चावल खिलाकर अपने भाई के कुशल-क्षेम और कल्याण की कामना करती हैं.
  • चौथे दिन कन्या की पूजा होती है, यह पूजा काली मंदिर में बड़े धूमधाम से की जाती है. इसके अलावा इस दिन घर को फूलों से सजाया जाता है, इस मौके पर महिलाएं घर के आंगन में रंगोली बनाती हैं, ये इस पर्व का आखिरी दिन होता है इसलिए लोग अपने नाते-रिश्तेदारों और दोस्तों से मिलने उनके घर जाते हैं और एक-दूसरे को इस त्योहार की शुभकामना सन्देश देते हैं, और सामूहिक भोज, भूमि दान, बैलों की दौड़ (जल्लिकट्टू) आदि किए आयोजन भी करते हैं.

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