मोदी ने क्यों ली धर्मेंद्र प्रधान की कुर्बानी? इस्तीफे के पीछे का सबसे बड़ा सियासी राज!

'झुकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए!' NEET पेपर लीक के महा-हंगामे में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद कॉकरोच जनता पार्टी के फाउंडर अभिजीत दीपके का यह तीखा बयान इस वक्त पूरे देश के सोशल मीडिया पर जंगल की आग की तरह वायरल हो रहा है! विपक्ष और छात्र संगठनों में जश्न का माहौल है, ढोल-नगाड़े बज रहे हैं और दावा ठोंका जा रहा है कि 'हमने मोदी सरकार के उस अजेय वाले अहंकार को घुटनों पर ला दिया है!' लेकिन रुकिए! क्या यह सच में मोदी सरकार का सरेंडर है? क्या 22 लाख छात्रों के गुस्से के आगे मजबूत आदमी वाली छवि ध्वस्त हो चुकी है? या फिर यह कोई मजबूरी का फैसला नहीं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी का अब तक का सबसे मास्टर पॉलिटिकल डैमेज कंट्रोल और 10 कदम आगे की बहुत बड़ी रणनीतिक चाल है? आइए जानते हैं। 

कहते हैं राजनीति में कोई फैसला सिर्फ फैसला नहीं होता...उसके पीछे कई परतें होती हैं...कई समीकरण होते हैं...और कई बार एक कदम पीछे हटना भी आने वाली बड़ी लड़ाई की तैयारी होती है। NEET पेपर लीक विवाद के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद देश की राजनीति में एक नई बहस छिड़ गई है। CJP और विपक्ष का दावा है कि उन्होंने मोदी सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया। लेकिन राजनीति के जानकारों के बीच एक दूसरा सवाल भी उठ रहा है। दरअसल, 3 मई को जैसे ही 22 लाख परीक्षार्थी केंद्रों से बाहर निकले, कोचिंग टीचर्स ने व्हाट्सएप और टेलीग्राम पर लीक पर्चे के सबूत NTA को भेज दिए थे। लेकिन शुरुआत में साहब लोग आराम फरमाते रहे। इसे मामूली स्थानीय गड़बड़ी और अफवाह बताकर दबाने की कोशिश की गई। लेकिन नतीजा ये रहा कि एक छोटी सी चिंगारी ने पूरे देश के युवाओं में आक्रोश का भयानक आग भड़का दी। 

जब राजस्थान से लेकर महाराष्ट्र तक गिरफ्तारियों का दौर शुरू हुआ और CBI जांच की मांग गूंजने लगी, तब भी सरकारी अमला जाँच-जाँच का ड्रामा रचता रहा। यहाँ तक कि संसदीय समिति के सामने भी डंके की चोट पर कहा गया कि 'कोई पेपर लीक नहीं हुआ!' इस अड़ियल और सुस्त रवैये ने लाखों छात्रों और उनके परिजनों के दिल में सिस्टम के प्रति अविश्वास की गहरी खाई खोद दी। वहीं जब चौतरफा सवाल दागे जाने लगे, तो सरकार की पहली प्राथमिकता सिस्टम में सुधार करना नहीं, बल्कि B-ग्रेड एजेंसी और NTA का बचाव करना बन गई। हर प्रेस कॉन्फ्रेंस में यही राग अलापा गया कि 'परीक्षा की निष्पक्षता से कोई समझौता नहीं हुआ!' लेकिन जब कोर्ट और मीडिया में सबूतों के चिथड़े उड़ने लगे, तो यही बचाव मोड सरकार के गले की फाँस बन गया।

वहीं लाखों छात्र और उनके माँ-बाप दिन-रात डिप्रेशन में झुलस रहे थे, लेकिन मंत्रालय की तरफ से कोई साफ और सीधा संवाद नहीं हुआ। सोशल मीडिया पर अफवाहों का बाजार गर्म होता रहा। बाद में सरकार ने कहा कि बिना फीस के दोबारा NEET ली जाएगी, पर तब तक जनता के बीच यह संदेश जा चुका था कि सरकार मामले पर पर्दा डालने की फिराक में है।
वहीं जब जंतर-मंतर पर हजारों छात्रों का सब्र टूटा और सुप्रीम कोर्ट में याचिकाओं की बाढ़ आ गई, तब जाकर सरकार की नींद खुली। पूर्व ISRO चीफ के. राधाकृष्णन कमेटी बनाई गई और NTA में फेरबदल का दौर शुरू हुआ। इसने साफ़ साबित कर दिया कि जब जनता की आवाज़ सड़कों पर गूँजती है, तो सबसे सख्त हुकूमत को भी अपने फैसले बदलने पड़ते हैं। हालांकि मोदी सरकार को आमतौर पर फैसलों पर अड़े रहने के लिए जाना जाता है। लेकिन इस केस में प्रशासन की नाकामी को स्वीकारा गया और आखिरकार शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। 

लेकिन आपको बता दें यहीं से सबसे बड़ी राजनीतिक बहस शुरू हुई। विपक्ष और आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि सरकार को पीछे हटना पड़ा। उनका दावा है कि छात्रों की आवाज और सड़क के दबाव ने सरकार को फैसला लेने पर मजबूर कर दिया। लेकिन दूसरी तरफ बीजेपी समर्थकों का कहना है कि यह झुकना नहीं बल्कि संकट प्रबंधन है। उनका तर्क है कि सरकार ने एक बड़े विवाद को लंबा खींचने के बजाय जिम्मेदारी तय करने का रास्ता चुना। यानी सरकार ने संदेश दिया कि व्यवस्था में कमी की जिम्मेदारी तय होगी। विवाद को शांत करने के साथ-साथ सरकार ने लॉन्ग-टर्म कार्ड भी खेल दिया। जी हां ऐलान किया गया कि 2027 से NEET परीक्षा पूरी तरह से कम्प्यूटर बेस्ड टेस्ट में होगी, ताकि टेलीग्राम और प्रिंटेड पेपर लीक की गुंजाइश ही खत्म हो जाए।

वहीं अब जानिए उस सबसे बड़े सियासी रहस्य को, जिसकी वजह से यह इस्तीफा इस वक्त दिलवाया गया! दरअसल, जंतर-मंतर पर धरने पर बैठे सोनम वांगचुक और CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके का आंदोलन संसद के मानसून सत्र पर भारी पड़ रहा था। 20 जुलाई को मानसून सत्र शुरू होते ही राहुल गांधी और विपक्ष ने सदन से लेकर पीएम आवास के बाहर तक कोहराम मचा दिया। संसद की कार्यवाही पूरी तरह ठप हो चुकी थी। बड़े मंत्रियों जे.पी. नड्डा और जितेंद्र सिंह को नौसिखिए नेताओं के साथ टेबल पर बैठना पड़ रहा था, जिससे सरकार की छवि खराब हो रही थी। लेकिन असली दांव तो संसद के भीतर था! सूत्रों के मुताबिक, सरकार इस मानसून सत्र में 13 अगस्त से पहले परिसीमन विधेयक पेश करने की गुप्त तैयारी में है। यह वही बिल है जिसे अप्रैल में महिला आरक्षण बिल के साथ लाने की कोशिश की गई थी, लेकिन दो-तिहाई बहुमत न होने से गिर गया था। सरकार समझ गई कि अगर परिसीमन जैसा ऐतिहासिक बिल पास कराना है, तो जंतर-मंतर की आग को तुरंत बुझाना होगा। लिहाजा, परंपरा और प्रतिष्ठा की परवाह न करते हुए धर्मेंद्र प्रधान की बलि दे दी गई ताकि संसद में असली सियासी बाजी जीती जा सके! जैसा कि वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने कहा था.......देर आए, दुरुस्त आए।

तो देखा आपने जिसे विपक्ष अपनी सबसे बड़ी जीत और सरकार का सरेंडर बताकर ढोल बजा रहा है, वो दरअसल बीजेपी की 'एक कदम पीछे खींचकर दस कदम आगे झपटने' की सोची-समझी साजिश है! अब देखना यह दिलचस्प होगा कि क्या जंतर-मंतर से खाली हाथ लौटे विपक्षी दल संसद के भीतर परिसीमन चक्रव्यूह को रोक पाएंगे? या फिर मोदी सरकार का यह दांव राजनीति के पन्नों में मास्टरस्ट्रोक साबित होगा? 

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