kamadeva Story: आखिर होली के दिन क्यों जीवित हुए थे कामदेव? जानें अनसुनी पौराणिक कथा
होली का पर्व केवल बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश ही नहीं देता, बल्कि यह प्रेम, त्याग और पुनर्जन्म की भावना को भी उजागर करता है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, फाल्गुन पूर्णिमा के दिन प्रेम के देवता कामदेव को नया अस्तित्व प्राप्त हुआ था। इसके पीछे एक गूढ़ और भावनात्मक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है।
तारकासुर और देवताओं की चिंता
पुराणों में वर्णित है कि असुर तारकासुर ने घोर तपस्या कर ऐसा वरदान पा लिया था कि उसका अंत केवल भगवान शिव के पुत्र के हाथों ही संभव होगा। लेकिन उस समय भगवान शिव, माता सती के देह त्याग के बाद, गहन साधना में लीन थे। देवताओं को चिंता सताने लगी कि जब तक शिव विवाह नहीं करेंगे, तब तक तारकासुर का वध असंभव है। ऐसे में शिव और पार्वती के विवाह के लिए कोई उपाय करना आवश्यक हो गया।
कामदेव का पुष्प बाण और शिव का क्रोध
देवताओं के अनुरोध पर प्रेम के देवता कामदेव ने शिव की समाधि भंग करने का दायित्व स्वीकार किया। उन्होंने अपने पुष्प बाण से भगवान शिव पर प्रेम का प्रभाव डाला। समाधि टूटते ही शिव क्रोधित हो उठे और अपना तीसरा नेत्र खोल दिया। उस अग्नि की ज्वाला में कामदेव भस्म हो गए और उनका स्थूल शरीर नष्ट हो गया।
रति की वेदना और तप
अपने पति का यह अंत देखकर कामदेव की पत्नी रति शोक में डूब गईं। उन्होंने भगवान शिव से क्षमा मांगते हुए कामदेव को पुनर्जीवित करने की प्रार्थना की। माता पार्वती ने भी रति की पीड़ा देखकर शिव से करुणा दिखाने का अनुरोध किया। मान्यता है कि कामदेव के भस्म होने से ही होलाष्टक की परंपरा की शुरुआत मानी जाती है। इसके बाद रति ने कठोर तपस्या कर शिव को प्रसन्न किया।
फाल्गुन पूर्णिमा और अनंग का वरदान
रति की तपस्या और पार्वती के निवेदन से द्रवित होकर भगवान शिव ने फाल्गुन पूर्णिमा के दिन कामदेव को पुनर्जीवन का वरदान दिया। हालांकि यह जीवन देह के साथ नहीं था। वे “अनंग” यानी बिना शरीर के, केवल प्रेम और भावना के रूप में संसार में विद्यमान हुए।
इसी कारण होली को केवल रंगों का पर्व नहीं, बल्कि प्रेम, उल्लास और नए आरंभ का प्रतीक माना जाता है। होली की अग्नि जहां अहंकार और नकारात्मकता के दहन का संकेत देती है, वहीं रंगों की मस्ती आपसी प्रेम और सौहार्द का संदेश फैलाती है।
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