आश्विन मास में भगवान विष्णु की नाभि से "कमल" प्रकट हुआ तब अन्य देवो से भी विभिन्न वृक्ष उत्पन्न

यक्षणामधिस्यापि मणिभद्रस्य नारद।

   वटवृक्ष: समभव तस्मिस्तस्य रति: सदा।।

          (वट पूनम विशेष)

लेखिका-निवेदिता सक्सेना

 वामन पुराण में वनस्पतियों की व्युत्पत्ति को लेकर एक कथा आती हैं आश्विन मास में भगवान विष्णु की नाभि से "कमल" प्रकट हुआ तब अन्य देवो से भी विभिन्न वृक्ष उत्पन्न हुए तब यक्ष के राजा "मणिभद्र" से वटवृक्ष उत्पन्न हुआ। जो कि "भारत का राष्ट्रीय वृक्ष" हैं।वर्तमान में जब कोरोना वायरस की त्रासदी रुक रुक कर अपना कहर ढा रही वही बार बार जन जन में ऑक्सीजन की कमी आ रही जो क्रत्रिम ऑक्सीजन पर अपने जीवन की माँग करते नजर आ रहे ।

इसी मध्य आया जयेष्ठ मास की वट अमावस्या औऱ वट पूनम जहा उत्तर भारतीय व बिहार ,मालवा अन्य राज्यो में बरगद के वृक्ष का पूजन किया जाता साथ ही "सत्यवान-सावित्री" की कथा के साथ पति की लंबी आयु समृद्धि ,वंश वृद्धि के लिए सुहागने वट वृक्ष की कच्चे सूत  के सात फेरे इस वृक्ष के करती व जिस प्रकार वट वृक्ष हजारो साल की आयु पाता हैं वैसे ही अपने सुहाग की कामना करती है। जहाँ सावित्री अपने मृत पति को वट वृक्ष के नीचे लेटा कर यमराज से अपने पति को तीन अमर वचनों को प्राप्त कर अपने सुहाग ,ससुराल, बच्चो  की रक्षा का वचन लेती हैं औऱ अपने पति को पुनः जीवंत अवस्था मे ले आती हैं।ये सब पौराणिक कथा ही नही वट वृक्ष का सत्य प्रतिरुप हैं।

वट वृक्ष को अक्षय वृक्ष के नाम से भी जाना जाता हैं जिसका कभी क्षय नही होता । ये सत्य है "वेदों से उपजा विज्ञान" भी वट वृक्ष की चिकित्सकीय प्रमानीकता को चरितार्थ करता हैं क्योंकि दो वृक्ष "पीपल व बरगद" हर समय ऑक्सीजन उत्सर्जित करते रहते  हैं ज्ञात है की  बरगद के वृक्ष में ब्रह्मा,विष्णु व महेश का वास बताया गया है इस कारण कई तीज-त्योहारो में इसका पूजन किया जाता हैं जैसे वट अमावस्या ,वट पूनम ,व दशा माता।  भगवान शिव व बुद्ध ने भी इसी वृक्ष के नीचे बैठकर तपस्या की थी कारण भी हैं। इस वृक्ष की जड़ें बड़ी होते होते एक विराट रूप ले लेती हैं इसकी वृहद शाखाओं से निकल कर इसे तने जैसी मजबूती प्रदान करती हैं। जिससे वृक्ष अत्यधिक घना होता जाता छाया तो ठीक इसके मध्य से कई सड़के भी बनी हैं औऱ कई जगह पुल रूपी गुफा भी इसके जड़,तना शाखा फल पत्ती अपने आप मे गुणों की खान लिए है।

आज वट पूनम ने फिर याद दिलाया कि आज पूजन हेतु "वट वृक्ष" भी शहरों व गाँवो में विलुप्तता के कागार पर आ खड़े हैं। कई लोगो ने घर के गमलो में ही बरगद की टहनी लगाकर पूजन किया तो कई महिलाओं ने वृक्ष छाया को कम पाया सत्य भी हैं आज हम भारतीय अपने राष्ट्रीय वृक्ष को ही भूलते जा रहे ।जब आये दिन जंगलो से वृक्ष घटते जा रहे ऐसे में ऑक्सीजन तो सिलेंडर से ही मिलना अब सम्भव हैं ।

वट वृक्ष का  वनस्पतिविज्ञान (बॉटनी) मे स्थान बरगद का वृक्ष जीव विज्ञान के पांच जगतो में "जगत  पादप" में आता हैं जिसका संघ-मैग्नोलियोफ़ाइटा, वर्ग-मैग्नोलियोप्सीडा, गण-रोसेल्स, फैमिली या कुल -"मोरसी", व द्विपद नाम अथार्त वानस्पतिक नाम - "फाइकस वेनगेलेँसीस "कहलाता हैं। ये द्विबीजपत्री पेड़ हैं। साथ ही ये वनस्पति जगत में सबसे ज्यादा ऑक्सीजन उत्सर्जित करने के कारण पर्यावरण सन्तुलन के लिए उत्कृष्ट श्रेणी का बताया गया हैं।

कोलकाता के आचार्य जगदीश चन्द्र बोस बॉटनिकल गार्डन में "द ग्रेट बनियान ट्री" जो सन 1787 में लगाया गया था आज 14,500 वर्ग मीटर फैला हुआ है भोपाल में कमला पार्क में स्थित बरगद 200 साल पुराना हैं। उज्जैन में सिद्धवट, मथुरा वृन्दावन का वंशीवट , गया का "गयावट" इसी प्रकार भारत के कई प्रान्तों राज्यो में आस्था का प्रतीक हैं । कई राज्यो में हजारों वर्ग फैले इन बरगद के वृक्षों के कई दार्शनिको व कई सन्त महात्माओ ने भी इन वृक्षों के नीचे प्रवचन व व्याख्यान व शास्त्रार्थ दिए है।

आज अंधाधुंध वनों की कटाई व भारत के राष्ट्रीय वृक्ष की उपेक्षा इसे विलुप्तता की ऒर ले जा रही हैं।वर्तमान समय जब कोरोना संक्रमण की विकट परिस्थितियों से गुजर रहा औऱ ऑक्सीजन की मांग इस राष्टीय वृक्ष के लिये चिंतन मनन करने की गुहार कर रही।

"जिम्मेदारी हमारी"

*वन विभाग सक्रियता से बरगद पीपल के वृक्ष को वरीयता के साथ संरक्षण प्रदान करे तब जबकि ये पेटेन्ट प्लांट में आता हैं।

* बारिश में वृक्षारोपण में आधिकाधिक इन वृक्षो को सड़कों के किनारे व मैदानों , नदी के किनारे  रोपित किये जाए ।

*बरगद ऑक्सीजन  का प्रकृति प्रदत्त उपहार हैं इसका संरक्षण ओर वृध्दि आवश्यक रूप से की जाना चाहिए।
* अपने पूर्वजों की याद में,बच्चो अथवा अपने परिजनों जन्म दिवस या पुण्य तिथि पर बरगद,पीपल का रोपण किया जाना प्रकृति को उपकृत करेगा जो हमारे लिए वरदान बनेगा।

रिपोटर : चंद्रकांत सी पूजारी

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