“आओ फिर से दिया जलाएँ: अटल बिहारी वाजपेयी की प्रेरणा”
भारतीय राजनीति और साहित्य के क्षेत्र में अटल बिहारी वाजपेयी का नाम हमेशा प्रेरणा का स्रोत रहेगा। उनके शब्द केवल राजनीति तक सीमित नहीं थे; वे मानवीय संवेदनाओं, देशभक्ति और आध्यात्मिक गहराई से परिपूर्ण थे। उनकी कविता “आओ फिर से दिया जलाएँ” इसी बात का जीवंत उदाहरण है।
कविता की पंक्तियाँ हमें एक बार फिर अपने भीतर के दीपक को जलाने, उम्मीद और साहस को जगाने की प्रेरणा देती हैं। वाजपेयी जी कहते हैं कि जैसे भरी दुपहरी में अँधियारा छा जाता है और सूरज अपनी परछाईं से हार जाता है, वैसे ही जीवन में भी निराशा और अज्ञानता छा सकती है।
कविता में वाजपेयी जी यह भी स्मरण कराते हैं कि हमें वर्तमान के मोहजाल में फंसकर आने वाले कल को नहीं भूलना चाहिए। लक्ष्य चाहे हमारे सामने दिखाई दे या नहीं, हमें अपने प्रयासों और संकल्प से उसे प्राप्त करने की दिशा में काम करना चाहिए।
भरी दुपहरी में अँधियारा
सूरज परछाईं से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें, बुझी हुई बाती सुलगाएँ
आओ फिर से दिया जलाएँ
हम पड़ाव को समझे मंज़िल
लक्ष्य हुआ आँखों से ओझल
वतर्मान के मोहजाल में आने वाला कल न भुलाएँ
आओ फिर से दिया जलाएँ
आहुति बाक़ी यज्ञ अधूरा
अपनों के विघ्नों ने घेरा
अंतिम जय का वज्र बनाने नव दधीचि हड्डियाँ गलाएँ
आओ फिर से दिया जलाएँ


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