प्राचीनकाल से ही हमारी भारतीय संस्कृति में शिक्षा का बड़ा महत्व रहा है।

शीर्षक÷ शिक्षा और समझदारी

लेखिका दीप्ति डांगे, मुंबई

प्राचीनकाल से ही हमारी भारतीय संस्कृति में शिक्षा का बड़ा महत्व रहा है। जिसका वर्णन हमारे वेदों में भी मिलता है।जैसे विद्यां ददाति विनयं ।विद्या से विन्रमता और योग्यता प्राप्त होती है। शिक्षा वह बहुमूल्य निधि है जो हमें इस योग्य बनाती है कि हम धन अर्जित कर सके साथ ही जिंदगी मे आने वाली समस्याओं का समाधान भी कर सकें, अच्छे और बुरे का भेद कर सके, अपने संस्कारो और गुणों में वर्द्धि कर सके।संक्षेप में शिक्षा मनुष्य को शिक्षित,विवेकशील, सबल और समझदार बनाती है। पर क्या आज की शिक्षा इतनी व्यहवारिक और परिपक्व है जो हमको सही मायनों में हमारा पूर्ण विकास कर सके?

नही, आज की जो शिक्षा है वो मैकाले की शिक्षा प्रणाली की देन है जो हमें साक्षर तो बनाती है पर शिक्षित नही। हमारी वर्तमान शिक्षण प्रणाली हमें केवल एक जॉब दे सकती है।लेकिन  विषय विशेषज्ञ या मालिक नही बना सकती। क्योंकि अंग्रेजो को नीति निर्धारण करने वाले व्यक्तियों की जरूरत नहीं थी, उन्हें सिर्फ काम के लिये कर्मचारी चाहिए थे जो उनके इशारों पर काम कर सके।इसलिये उन्होने इस तरह की  शिक्षा प्रणाली विकसित की, जिससे वो देश को गुलाम बनाए रख सके।

74 साल से हम आजाद होने के बाद भी शिक्षा प्रणाली में जरूरत के मुताबिक परिवर्तन नहीं कर सके और बहुत हद्द तक मैकाले शिक्षा प्रणाली ही अपनायें हुए है।जो शायद हमारे राजनीतिक व बुद्धिजीवियों की इच्छाशक्ति की कमी के कारण है।जो हमे केवल एक किताबी ज्ञान देती है और केवल धन अर्जित करने का साधन बन कर रह गयी।और इस तरह की शिक्षा को हम समझदारी का पैमाना मानने लगे गए है जो जितना ज्यादा साक्षर होगा वो उतना अधिक समझदार माना जाता है।लेकिन शिक्षा और समझदारी में अंतर है।

शिक्षित वह जिस को ज्ञान, तकनीकी दक्षता तथा विद्या का ज्ञानहो। जो पढ़ने लिखने व सीखने से आती है।शिक्षा द्वारा ही मनुष्य की क्षमताओं को शक्तियों को विकसित कर के ज्ञानवान और कुशल बनाया जाता है । समझदारी वह जिसे दुनियादारी का ज्ञान हो। जो अनुभव व अभ्यास से आती है। ये हर इंसान में होती है, किसी में कम तो किसी को अधिक यह पाई जाती है । इसे सतर्क और विवेकशील व्यक्ति निरंतर अभ्यास करके स्थाई गुण बनाते हैं, और अपने व्यक्तित्व को समृद्ध बनाते हैं । इसमें समझदारी, दूरदर्शिता और विवेकशीलता अनिवार्य रुप से विद्यमान रहती है ।और सही शिक्षा से समझदारी में वृद्धि होती है।

प्राचीन भारतीय शिक्षा न केवल मनुष्य को शिक्षित करती थी बल्कि,व्यक्ति को बहुत समझदार और बेहतर इंसान बनाने में मदद करती थी। जो सभी बाधाओं को हराने की क्षमता रख सके। आज की शिक्षा से बच्चों में बस गला काट प्रतियोगिता,असुरक्षा,भय की भावना पैदा कर दी है लेकिन उसका सामना करने का मार्ग ये शिक्षा नही देती।जिससे बच्चे गलत रास्तो पर चले जाते है कोई आत्महत्या कर रहा है तो  कोई डिप्रेशन में चला जाता है।जो हमारे देश के लिये एक बहुत बड़ी समस्या है।लेकिन राहत की बात ये है कि 34 साल बाद शिक्षा नीति में बदलाव किया गया है

जिसका उद्देश्य छात्रों की सोच और रचनात्मक क्षमता को बढ़ाकर सीखने की प्रक्रिया को और अधिक कुशल बनाना। इस नई शिक्षा प्रणाली में गुणवत्तापूर्ण तथा सार्वभौमिक शिक्षा के साथ ही व्यवसायिक शिक्षा पर भी बल दिया गया है।इसमें भारतीय संस्कृति की विविधता का उचित समावेश किया गया है।जिसका उद्देश्य विद्यार्थी का सर्वांगीण विकास करना है।इसका प्रयोजन सिर्फ जीवन चलाने का एक साधन मात्र ही नहीं वरन जीवन जीने की एक कला भी है शिक्षा के माध्यम से जहां  हम अपने सपने पूरे कर सके वही हम अपने जीवन को नई दिशा दिखा सके।आशा करते है कि नई शिक्षा प्रणाली देश के भविष्य को एक नही दिशा प्रदान करे जिनके लिये शिक्षा एक प्रतियोगिता और कमाने का साधन भर न रहे। बल्कि देश का स्वर्णिम काल वापस आये और भारत वैश्विक ज्ञान का केंद्र बने।

रिपोटर : चंद्रकांत सी पूजारी

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