पहले समय में कहा जाता था कि पढोगे लिखोगे तो बनो के नवाब खेलोगे कूदोगे तो होंगे खराब। यही सोच आज भी ज्यादातर माता पिता की है

आलेख

शीर्षक वर्चुअल होती जिंदगी

लेखिका दीप्ति डांगे, मुम्बई

पहले समय में कहा जाता था कि पढोगे लिखोगे तो बनो के नवाब खेलोगे कूदोगे तो होंगे खराब। यही सोच आज भी ज्यादातर माता पिता की है।  आज भी बच्चो का बाहर खेलना सिर्फ मनोरंजन मात्र या बच्चे के स्वास्थ्यलाभ तक ही सीमित है। जो कुछ सालों बाद कमरे मे कंप्यूटर या मोबाइल तक सीमित हो जाता है। और बच्चे मोबाइल और कंप्यूटर की दुनिया मे खो जाते है। धीरे धीरे हालात ऐसे हो रहे है कि पूरी दुनिया से हमारा रिश्ता सिर्फ आभासी दुनिया के जरिये ही रह गया है।

पहले जहां दोस्त साथ बैठ कर बातें, मस्तिया करते थे अब साथ बैठकर मोबाइल पर खेल खेलते है। एक व़क्त था जब शाम का खाना खाते व़क्त घर के सभी सदस्य दिनभर के अपने अनुभवों को एक-दूसरे से शेयर करते थे।बातें करते थे। हंसी मजाक करते थे।लेकिन आज ये नज़ारा बदल गया है। ज़्यादातर सदस्य अपने-अपने मोबाइल फोन में बिज़ी रहते हैं।बेडरूम में भी टेक्नोलॉजी,रिश्तों पर भारी पड़ रही है।अपने लैपटॉप पर ऑफिस का काम निपटाते पार्टनर के साथ मिलने वाले पर्सनल स्पेस पर भी टेक्नोलॉजी का कब्ज़ा होता जा रहा है।

जहाँ त्योहारों पर परिवार और रिश्तेदार मिलकर त्योहार मनाते थे और त्योहारों के मजे लेते थे।आज सिर्फ सोशल मीडिया पर एक दूसरे को शुभकामनाये देकर अपने दायित्व की पूर्ति कर लेते है। जो एक बहुत चिंता का विषय बन रहा है।कोविद 19 के बाद से इस समस्या ने ओर विकराल रूप ले लिया है।क्या ये भी एक तरह का नशा है? जो न केवल युवा पीढ़ी को बर्बाद कर रहा बल्कि छोटे छोटे बच्चों को भी अपनी गिरफ्त मे ले रहा है। इसके जिम्मेदार क्या अभिभावक भी है? ये सही है कि आज कंप्यूटर, मोबाइल गेम और कार्टून रूपी नशे को बच्चो तक पहुचाने  मे माता पिता का बहुत बड़ा हाथ है।

आज की चकाचौध दुनिया के चलते,समय की कमी, एकल परिवार और एक बच्चे के कारण वह संतान को समाज का उसके जीवन में क्या महत्व है तथा उसके सामाजिक जीवन को चयन करने की दिशा क्या होगी?बच्चों के जीवन में संस्कृति और सास्कृतिक मूल्यों की सनातनधर्मिता की सीख देने की बजाय छोटे छोटे बच्चो को मोबाइल देकर अपने दायित्व की पूर्ति कर रहे है और बड़े गर्व से कहते है कि हमारा बच्चा छोटी सी उम्र में मोबाइल और कंप्यूटर चला लेता है। कुछ समय बाद ये एक लत की तरह बच्चो की जिंदगी मे शामिल हो जाता है ।

जिसके चलते बच्चे पूरी तरह से कंप्यूटर और मोबाइल पर निर्भर हो जाते है और वर्चुअल वर्ल्ड मे खोने लगते है। धीरे धीरे हालात ऐसे होते जाते है कि  जहां पहले बच्चे खेलने के लिए खिलोने मांगते थे खेलने के लिए लूडो, कैरम  कबड्डी, फुटबॉल जैसे खेल खेलते थे दोस्तो से ढेरो बातें होती थी लेकिन कंप्यूटर मोबाइल के कारण वो आभासी दुनिया मे चले जाते है और उसी दुनिया मे खुश रहने लगते है।

घर परिवार दोस्तो सबसे दूर होकर वर्चुअल दुनिया मे इमोशनल टच खोजने लगते है। उनपर अपना गुस्सा, कुंठा निकालने लगता है।जिससे उनका पूरा विकास ही नही हो पाता और वो मानसिक, भावनात्मक  और शारीरिक रूप से कमज़ोर होने लगते है। जिससे ये बहुत जल्दी आपा खोना और गुस्सा करते है।कुछ नया करने में रुचि नहीं दिखाते एकाग्रता की कमी और यादाश्त कमजोर होने लगती है।

बात करने के तरीके में बनावटीपन और किसी कैरेक्टर की नकल करने लगते है।और जिम्मेदारियों से भागने लगते है दुनिया और परिवार से कटने लगते है और माता पिता से भी सिर्फ कार्येपूर्ति हेतु सम्बद्ध रखने रखते है।जो बच्चो के बड़े होने के साथ ही परिवारों और समाज के लिये एक बड़ी समस्या का कारण बन जाती है। किसी भी क्षेत्र में पिछड़ने पर नकारात्मक विचार उत्तपन्न होने लगते है और उनका सामना न कर पाने के कारण मानसिक रोगी तक बन जाते है कभी कभी हालात ऐसे हो जाते है कि वो आत्महत्या तक करने की सोचने लगते है या  किसी का छोटे से छोटा कमेंट भी उन्हें नागवार गुजरता है।

छोटी छोटी बात पर रिएक्ट करने के साथ ही एग्रेसिव व्यवहार करते हैं।और हिंसात्मक हो जाते है इसके चलते अभिभावक भी इनसे अछूते नही है जहां तक हालात ऐसे बन रहे है कि इन गेम के लेवल खेलने के लिए या किसी और बात के लिये बच्चो द्वारा अभिभावकों से धन की मांग करते है और माता पिता के न देने पर या तो चोरी करने लगते है या कुछ बच्चे तो इस  लत के चलते  माता पिता का खून करने मे भी पीछे नही हटते।

यह उनके करियर और भविष्य के लिये बहुत घातक है। पिछले सात आठ सालों में इस प्रकार के केस बढ़े हैं। ये स्थिति कोविड पेंडेमिक में ऑनलाइन एजुकेशन होने के कारण ओर भयवाह हो गयी है।बच्‍चों के लिए  भी अब मोबाइल और लैपटॉप उनका स्कूलरूम बैग, पुस्तक बन गए है। स्‍कूलों का संचालन पूरी तरह से वर्चुअल हो चुका है।जिसके कारण अब बच्चो को ये वर्चुअल दुनिया अपनी असली लाइफ ही लगने लगी है।

जिसके कारण वर्चुअल संसार अब ओर ज्यादा आक्रामक हो चुका है। पर इस पर दिखाई जा रही हिंसा, आक्रामकता और भद्दी भाषा बच्चों  के व्यक्तित्व को ओर ज्यादा प्रभावित कर रही है।
पिछले साल से पहले तक हम इस बात पर चर्चा किया करते थे कि स्‍क्रीन टाइम को किस तरह से बच्चो के लिए सीमित करें। साथ ही बच्‍चों को अलग-अलग तरह के गैजेट्स तथा सोशल मीडिया प्‍लेटफार्मों से किस प्रकार दूर रखा जाए। लेकिन महामारी के दौर में यही गैजेट्स बच्चो की जिंदगी का हिस्सा बन रहे है। 

खासकर उन परिवारों में जहां माता पिता दोनों ही वर्किंग हों। माता पिता के पास समय नही है।वहां बच्चे ज्यादा वर्चुअल दुनिया मे डूब रहा है।कंप्यूटर का इस्तेमाल समय की बर्बादी नहीं है, लेकिन लत एक बुरी बात है जो बच्चो के भविष्य को खत्म कर देती है। उनकी सोचने समझने की शक्ति को सीमित कर देती है।

जिससे बचाना मां-बाप की जिम्मेदारी है। अब कोविद का प्रकोप भी धीरे धीरे कम हो रहा जिंदगी फिर से सही रास्ते पर आ रही स्कूल खुल रहे है। आशा है कि बच्चे इस वर्चुअल दुनिया से भी बाहर आएंगे लेकिन इसके लिए माता पिता को इस बात का ख्याल रखना है ताकि बच्चे कंप्यूटर के चक्कर में बर्बाद न हो जाएं। माता पिता को अपने बच्चों के साथ समय बिताना बहुत जरूरी है। कभी दोस्त बनके तो कभी भाई बहन बनकर तो कभी शिक्षक बन कर जिससे बच्चा माता पिता से भावनात्मक रूप से जुड़ेगा साथ ही साथ उसका  आत्मविश्वास बढेगा और क्रिएटिव कार्यों के प्रति उसका लगाव बढेगा।

कुछ समय पहले 10 जिलों में कराए गए एसोचैम के सर्वे में पता लगा कि 8 से 18 साल की उम्र के करीब 55 फीसदी बच्चे रोजाना पांच घंटे से भी ज्यादा समय कंप्यूटर के सामने बैठकर बिता रहे हैं। इनमें से ज्यादातर बच्चे या तो फेसबुक जैसी किसी सोशल नेटवर्किग साइट से चिपके रहते हैं या फिर यूट्यूब पर वीडियो देखते रहते हैं। टैबलेट, गेमिंग कन्सोल्स और स्मार्टफोन से उन्हें कहीं भी, कभी भी अनलिमिटेड इंटरनेट एक्सेस मिल जाती है

और बच्चे घंटो सोशल मीडिया, गेमिंग ओर कार्टून्स मे अपना समय बिताने लग जाते है आज सबसे पहले, बच्चे के लिए कंप्यूटर के सामने बैठने का समय तय करना जरूरी है जैसे चीन की सरकार ने नियम बनाये है कि 18 साल से छोटे चीनी बच्चों को हफ्ते में तीन घंटे से ज्यादा ऑनलाइन वीडियो गेम खेलने की इजाजत नहीं होगी वो भी सप्ताहांत में हालांकि, यह कहना आसान है, भारत मे ये करना सरकार के लिये बहुत मुश्किल होगा क्योंकि भारत एक लोकतांत्रिक देश है लेकिन अभिभावकों को थोड़ा सा ध्यान देना होगा और खुद ही नियम बनाने होंगे बच्चो के लिए। अच्छी बात यह है कि अब ऐसी कंप्यूटर एप्लिकेशन आ गई हैं, जो कंप्यूटर पर काम करने की ‘समय सीमा’ तय करती हैं। 

भारत आज एशिया में तीसरा और विश्व में चौथा देश है।साथ ही इंटरनेट प्रयोग करने वाली 85 फीसदी आबादी यहा 14 से 40 वर्ष के बीच है.

आज हमारा देश एक युवा राष्ट्र जाना जाता है। जिसकी आयु लगभग 29-30 वर्ष है जिनकी आँखों में सपने कुछ कर दिखाने के, मन में तूफानों सी गति होती है,परिवर्तन की ललक, अदम्य साहस, स्पष्ट संकल्प लेने की चाहत होती है। ये तभी संभव हो सकता है जब आज के बच्चे और युवा की आंखों में सपने हो और उनको पूरा करने की ललक जिसके लिये मेहनत, लगन, एकाग्रता, धीरज और सकारात्मक सोच जरूरी है जो हमको दुनिया के अनुभव से ही मिल सकती है। वर्चुअल दुनिया बुरी नही है पर उसकी लत असली दुनिया से दूर कर एक भ्रामक दुनिया में ले जाती है जैसे मादक दवाएं। अगर कंप्यूटर और मोबाइल का प्रयोग समझदारी से किया जाए तो यही आपको आपके लक्ष्य तक पहुँचाने मे सहयोग करेगे। पर इसके लिए समझदारी बहुत जरूरी है।

रिपोर्टर ; पूजारी 

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