लकी है सुल्तानपुर सदर विधानसभा सीट, यहां से खुलता है यूपी की सत्ता का दरवाजा; संजय सिंह ने यही से किया चुनावी शंखनाद

लकी है सुल्तानपुर सदर विधानसभा सीट
सुल्तानपुर से खुलता है यूपी की सत्ता का दरवाजा
परिवर्तन की लहर को भांप लेते हैं सुल्तानपुर के मतदाता
1996 से 2012 तक इस सीट पर था बसपा का कब्जा

पांच माह बाद उत्तर प्रदेश में विधानसभा का चुनाव होना है। प्रमुख विपक्षी दलों के साथ-साथ सत्तासीन बीजेपी भी सभी 403 सीटों पर जित दर्ज करने का ऐलान कर चुकी है।ऐसे में प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में इस बार सत्ता पर कौन विराजमान होगा, वह तो राज्य के मतदाताओं के हाथ में है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में कई सीट ऐसी है जो उत्तर प्रदेश के चुनाव के लिए बेहद अहम है उन्ही में से है सुल्तानपुर सदर विधानसभा सीट, इस सीट को सत्ता के लिए 'लकी' माना जाता है।

पूर्वांचल और अवध के बीच की कड़ी जिला सुल्तानपुर की इस सीट पर बीते 45 वर्षो से सत्तारूढ़ दल का विधायक ही विराजमान रहा है। या यूं कह लें कि इस सीट पर जिस पार्टी का विधायक जीतता है, उसी पार्टी के हाथ में राज्य की सत्ता भी आती है। यह सीट है सुल्तानपुर सदर, जहां से इस समय भाजपा के सीताराम वर्मा विधायक हैं। 2012 में सपा के अरुण कुमार यहां से विधायक बने थे। 2009 के परिसीमन से पहले इस सीट का नाम जयसिंहपुर था। बता दें कि यब विधानसभा सीट तब चर्चा में आई थी, जब 2017 में पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने विधानसभा चुनाव का शंखनाद करने के लिए इस सीट को चुना था।

इस सीट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि जब भी राज्य में सत्ता की लहर में परिवर्तन हुआ तो यहां के वोटर्स परिवर्तन की उस लहर को फौरन ही भांप गए। इस सीट के भाग्यशाली होने का सिलसिला 1969 में कांग्रेस प्रत्याशी श्यो कुमार के जीतने से शुरू हुआ। इसके बाद जब 1977 में पूरे देश की राजनीतिक फिजां बदली और जनता पार्टी की लहर चली तो यहां से भी जनता पार्टी के प्रत्याशी मकबूल हुसैन खान ने बाजी मारी, लेकिन तीन साल बाद ही 1980 में कांग्रेस प्रत्याशी देवेंद्र पांडे जयसिंहपुर सीट से जीते और राज्य में कांग्रेस सरकार की वापसी हुई। जनता पार्टी से टूटकर अलग हुए जनता दल ने 1989 में उत्तर प्रदेश की सत्ता पर पहली बार कब्जा जमाया और इस बार जयसिंहपुर की अवाम ने जनता दल के उम्मीदवार सूर्यभान सिंह को सत्ता की चाबी सौंपी। 90 का दशक सिर्फ राज्य में ही नहीं बल्कि पूरे देश में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नई राजनीतिक शक्ति के रूप में उभर कर आने का दशक रहा।

1991 में जयसिंहपुर सीट से पहली बार भाजपा का कोई उम्मीदवार जीता और राज्य में भी पहली बार भाजपा ने सरकार बनाई। 2012 में सपा से अरुण वर्मा ने यहां जीत दर्ज की थी...हालांकि 2017 में इस सीट से यूपी चुनाव का आगाज करने वाले पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का काफी नुकसान हुआ। उनकी पार्टी सत्ता में आना तो दूर मोदी लहर में सम्मानजक स्थिति में भी नही पहुंच सकी। यहां से सपा के प्रत्याशी अरुण वर्मा को हराकर भाजपा के प्रत्याशी सीताराम वर्मा ने जीत दर्ज की थी।

 वही अब जब 2022 का चुनाव होना है और सभी पार्टियाँ तैयारियों में जुटी हुई है और हर अहम् सीटों को साधने में जुटी हुई है तो दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी ने सुल्तापुर की इसी सीट से चुनावी शंखनाद किया है तो उनका यह कदम उन्हें कितना फायदा पहुंचाएगा, इस सवाल का जवाब अतीत के गर्त में है।लेकिन ये बड़ा सवाल है की आखिर इस बार सुल्तानपुर की ये खस सीट क्या यूपी की सियासत का पूरा समीकरण बदल देगी....

 

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