मिट्टी की खुशबू से मोबाइल की दुनिया तक: बदलती पीढ़ियों का सफर
बदलते समय के साथ जीवन की बहुत-सी खूबसूरत यादें कहीं पीछे छूट गई हैं। कभी सावन का मौसम झूलों, लोकगीतों, सखियों की हँसी और रिश्तों की मिठास से भर जाता था। आज तकनीक और व्यस्तताओं के बीच वे सहज पल केवल स्मृतियों में रह गए हैं। इन्हीं खोती हुई परंपराओं और बचपन की सुनहरी यादों को समर्पित यह भावपूर्ण कविता प्रस्तुत है -
मोबाइल
कहाँ गए सावन के झूले...
कहाँ गई वो 'पींग'...
कहाँ पड़ी बुंदिया सावन की
वो सावन के गीत
कहाँ गई सखियों की टोली
कहाँ गया गुडियों का खेल
कहाँ गई वो 'आईस-बाईस'
कहाँ गई बच्चों की रेल
कहाँ गए वो रिश्ते-नाते
कहा गई स्नेह की डोर
रिश्ते-ग्लोबल सिमट गए हैं
मोबाइल का सारा खेल
- नीलप्रभा भारद्वाज
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