संसद में बंद कमरे में क्या पका? Rahul-Akhilesh की मुलाकात से BJP में हलचल!
दिल्ली का तापमान भले ही मौसम से गरम हो या न हो, लेकिन संसद के भीतर का सियासी पारा बिल्कुल 100 डिग्री पार चला गया है! मॉनसून सत्र का पहला ही दिन था, चारों तरफ विपक्ष का हंगामा, पेपर लीक से लेकर अयोध्या राम मंदिर चढ़ावा चोरी के मुद्दे पर नारेबाजी...और इसी गहमागहमी के बीच लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के दफ्तर का दरवाजा बंद होता है। अंदर बैठते हैं राहुल गांधी, समाजवादी पार्टी के सर्वेसर्वा अखिलेश यादव और साथ में प्रियंका गांधी वाड्रा! पूरे एक घंटे तक चली इस हाई-वोल्टेज सीक्रेट मीटिंग ने दिल्ली से लेकर लखनऊ तक की सियासत में भूचाल ला दिया है। आखिर बंद कमरे में क्या पक रहा था? क्या 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव का सबसे बड़ा चक्रव्यूह रचा जा चुका है? आइए आपको बताते हैं इस रिपोर्ट में...
दरअसल, संसद की कार्यवाही जैसे ही पहली बार स्थगित हुई, ज्यादातर सपा सांसद तो जंतर-मंतर की तरफ निकल पड़े। डिंपल यादव भी चली गईं। लेकिन अखिलेश यादव अलग ही मूड में थे। वो अपने दो-तीन खास सांसदों को साथ लेकर सीधे राहुल गांधी के कमरे में दाखिल हो गए। उनके साथ अयोध्या के सपा सांसद अवधेश प्रसाद भी थे। लेकिन असली ट्विस्ट देखिए! मीटिंग के मुख्य दौर में सिर्फ तीन ही लोग थे....राहुल, अखिलेश और प्रियंका। अवधेश प्रसाद बाहर ही रहे। जब पत्रकारों ने अवधेश प्रसाद से पूछा...."अरे सांसद जी, अंदर क्या बात हुई?" तो वो मुस्कुराते हुए बोले...."भइया, बहुत सी बातें रणनीति का हिस्सा होती हैं, सबका ढिंढोरा नहीं पीटा जाता!" वहीं अखिलेश यादव से जब पूछा गया तो उन्होंने हमेशा की तरह अपने देसी अंदाज में सवाल टालते हुए कहा...."अरे भाई, सदन स्थगित होता है तो लोग मिलते ही हैं!" पर हम और आप जानते हैं कि राजनीति में यूँ ही कोई एक घंटे तक चाय की चुस्कियाँ नहीं लेता!
आपको बता दें हाल ही में यूपी कांग्रेस के प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने 403 में से सीधी-सीधी 200 सीटों का दावा ठोक दिया था। उधर कांग्रेस सांसद इमरान मसूद भी अखिलेश यादव पर तंज कस रहे थे कि वो मुस्लिम मुद्दों की अनदेखी कर रहे हैं। हालांकि सपा वाले भी कहाँ चुप रहने वाले थे, उनकी तरफ से भी पलटवार चालू था। लेकिन इस मीटिंग के बाद तो इमरान मसूद के सुर ही बदल गए! एकदम से प्यार उमड़ पड़ा और बोले...."अखिलेश जी बड़े नेता हैं, बड़े लोग बैठेंगे तो रास्ता निकलेगा ही। आपको बता दें कांग्रेस भले ही 200 सीटें चिल्ला रही हो, लेकिन उसकी असली नज़र 100 सीटों पर है। उनका कहना है कि 2017 में जब अखिलेश के साथ लड़े थे, तब सपा ने 105 सीटें दी थीं। तो इस बार 100 से कम पर बात कैसे बने? कांग्रेस का तर्क है कि अगर उन्हें ज्यादा सीटें मिलीं, तो दलित वोटर गठबंधन से मजबूती से जुड़ेंगे। जैसे 2024 के लोकसभा चुनाव में यूपी की 80 में से 43 सीटें गठबंधन ने जीती थीं, जिसमें सपा को 37 और कांग्रेस को 6 सीटें मिली थीं। लेकिन अखिलेश यादव का गणित एकदम साफ है..."सीट नहीं, जीत महत्वपूर्ण है!" सपा का कहना है कि 2017 का माहौल अलग था, तब शिवपाल यादव की नाराजगी थी, पारिवारिक कलह थी। अब हालात बदल चुके हैं। अखिलेश चाहते हैं कि कांग्रेस सिर्फ हवा में बातें न करे, अपनी दावेदारी वाली सीटों के साथ मजबूत उम्मीदवारों की लिस्ट भी दे। सपा का साफ मानना है कि बूथ स्तर पर लड़ने वाला कार्यकर्ता चाहिए और कांग्रेस के पास ज़मीन पर जुझारू कार्यकर्ताओं की कमी है। सपा के हिसाब से कांग्रेस को 80 के आसपास सीटें ही दी जा सकती हैं।
कुल मिलाकर अब सबसे बड़ा सवाल यही है! अखिलेश यादव के सामने सबसे बड़ी चुनौती है मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को यूपी में हैट्रिक लगाने से रोकना। और इस जंग में कांग्रेस को साथ लेकर चलना उनकी मजबूरी भी है और रणनीति भी। दूसरी तरफ कांग्रेस भी जानती है कि अकेले दम पर वो यूपी में कुछ खास नहीं कर सकती। 2022 के चुनाव में प्रियंका गांधी के अकेले प्रचार करने के बावजूद कांग्रेस को सिर्फ 2 सीटें और 2 फीसदी वोट मिले थे। यानी दोनों को एक-दूसरे की जरूरत है। राहुल और अखिलेश ने बंद कमरे में जो चक्रव्यूह रचा है, उसका असली असर आने वाले दिनों में संसद के हंगामे और यूपी की सड़कों पर साफ दिखाई देगा। अब देखना दिलचस्प होगा कि क्या अखिलेश अपनी ज़िद पर अड़े रहते हैं या कांग्रेस को दिल खोलकर सीटें देते हैं!
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