पीरियड्स अचानक बदलने लगे हैं? शरीर दे रहा हो सकता है बड़ा संकेत
कभी पीरियड्स समय से पहले आ रहे हैं, कभी कई हफ्तों तक कोई खबर नहीं… कभी ब्लीडिंग बहुत ज्यादा तो कभी बेहद कम। साथ में अचानक शरीर गर्म होने लगता है, रात में पसीना आता है और नींद भी पहले जैसी नहीं रहती। ऊपर से मूड ऐसा बदलता है कि खुद समझ नहीं आता कि आखिर हो क्या रहा है।
अगर 35-40 की उम्र के आसपास आप ऐसे बदलाव महसूस कर रही हैं, तो हर बार इसे सिर्फ तनाव, उम्र या कमजोरी मानकर नजरअंदाज करना ठीक नहीं है। शरीर में होने वाले ये बदलाव पेरिमेनोपॉज की शुरुआत का संकेत हो सकते हैं।
डॉक्टरों के मुताबिक मेनोपॉज अचानक नहीं आता। उससे पहले शरीर धीरे-धीरे एक ऐसे दौर में प्रवेश करता है, जिसमें हार्मोन के स्तर में उतार-चढ़ाव शुरू हो जाता है। इसी चरण को पेरिमेनोपॉज कहा जाता है।
मेनोपॉज से पहले शरीर क्यों बदलने लगता है?
मेनोपॉज वह अवस्था है जब लगातार 12 महीनों तक पीरियड्स नहीं आते। लेकिन इस स्थिति तक पहुंचने से पहले शरीर में हार्मोनल बदलाव शुरू हो सकते हैं।
इस दौरान एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे हार्मोन के स्तर में उतार-चढ़ाव होने लगता है। इसका असर सिर्फ पीरियड्स पर नहीं बल्कि नींद, मूड, शरीर के तापमान और कई दूसरे शारीरिक बदलावों पर भी पड़ सकता है।
सबसे पहला संकेत—पीरियड्स का पैटर्न बदलना
पेरिमेनोपॉज का सबसे आम संकेत पीरियड्स का अनियमित होना बताया जाता है।
मसलन—
- पीरियड्स सामान्य तारीख से पहले आ सकते हैं।
- कभी कई हफ्तों या महीनों का अंतर हो सकता है।
- ब्लीडिंग पहले से कम या ज्यादा हो सकती है।
- पीरियड्स की अवधि में भी बदलाव महसूस हो सकता है।
लेकिन हर महिला में इसका अनुभव एक जैसा नहीं होता। कुछ महिलाओं में बदलाव बहुत हल्के होते हैं, जबकि कुछ के लिए ये रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगते हैं।
सिर्फ पीरियड्स ही नहीं, ये संकेत भी दिख सकते हैं
पेरिमेनोपॉज के दौरान शरीर कई तरह से संकेत दे सकता है। इनमें अचानक गर्मी महसूस होना यानी हॉट फ्लैशेज, रात में ज्यादा पसीना आना और नींद खराब होना शामिल है।
इसके अलावा—
मूड स्विंग्स और चिड़चिड़ापन: छोटी-छोटी बातों पर मूड बदलना या चिड़चिड़ापन महसूस होना।
थकान: पर्याप्त आराम के बावजूद शरीर में ऊर्जा की कमी महसूस होना।
एकाग्रता में कमी: किसी काम पर फोकस करने में परेशानी या चीजें याद रखने में दिक्कत महसूस होना।
योनि में सूखापन: कुछ महिलाओं को वैजाइनल ड्राइनेस या सेक्स के दौरान असहजता हो सकती है।
शरीर और वजन में बदलाव: शरीर की संरचना और वजन में भी बदलाव महसूस हो सकता है।
35-40 की उम्र के बाद इन बदलावों को समझना क्यों जरूरी?
डॉक्टरों का कहना है कि मिड-लाइफ में महिलाओं को अपनी सेहत को लेकर ज्यादा सजग रहना चाहिए। संतुलित डाइट, पर्याप्त प्रोटीन और कैल्शियम, नियमित एक्सरसाइज, अच्छी नींद और तनाव को नियंत्रित करना इस दौर में महत्वपूर्ण हो जाता है।
इस उम्र में हड्डियों की मजबूती, ब्लड प्रेशर, वजन और हार्ट हेल्थ जैसे स्वास्थ्य मानकों पर भी ध्यान देना जरूरी है।
हर अनियमित पीरियड को मेनोपॉज न समझें
यह बात खास तौर पर ध्यान देने वाली है।
पीरियड्स का अनियमित होना हमेशा पेरिमेनोपॉज या मेनोपॉज की वजह से ही हो, ऐसा जरूरी नहीं है। इसके पीछे दूसरी स्वास्थ्य समस्याएं भी हो सकती हैं।
इसी तरह हर हार्मोनल बदलाव का मतलब यह नहीं कि किसी बीमारी की शुरुआत हो गई है। और हर महिला को हार्मोन थेरेपी की जरूरत भी नहीं होती। उपचार का फैसला लक्षणों और मेडिकल हिस्ट्री को देखकर डॉक्टर करते हैं।
कब डॉक्टर से तुरंत मिलना चाहिए?
अगर ब्लीडिंग बहुत ज्यादा या असामान्य हो रही है, लंबे समय तक पीरियड्स नहीं आने के बाद दोबारा ब्लीडिंग शुरू हो गई है या लक्षण इतने ज्यादा हैं कि रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगी है, तो इसे नजरअंदाज न करें।
ऐसी स्थिति में गायनेकोलॉजिस्ट से सलाह लेना बेहतर है। सही समय पर जांच और उचित सलाह से इस बदलाव के दौर को ज्यादा आराम से मैनेज किया जा सकता है।
पेरिमेनोपॉज कोई बीमारी नहीं, बल्कि शरीर में होने वाला एक प्राकृतिक संक्रमणकाल हो सकता है। लेकिन इसके संकेतों को पहचानना जरूरी है, ताकि किसी दूसरे स्वास्थ्य कारण को नजरअंदाज न किया जाए।
पीरियड्स में बदलाव को सिर्फ “उम्र बढ़ने” का असर समझकर चुप रहने के बजाय अपने शरीर को सुनिए—क्योंकि कई बार शरीर पहले ही संकेत दे देता है कि उसमें एक बड़ा बदलाव शुरू हो चुका है।
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