13 ऐसे डरावने विमान हादसे, जिनकी वजह से हवाई यात्रा के नियम और तकनीक हमेशा के लिए बदल गए
Ajit Pawar Died in Plane Crash:महाराष्ट्र के बारामती में बुधवार सुबह एक दर्दनाक विमान दुर्घटना हुई, जिसमें NCP के वरिष्ठ नेता और उप मुख्यमंत्री अजित पवार सहित कुल पाँच लोगों की जान चली गई। विमान हादसे सबसे भयावह माने जाते हैं, क्योंकि इनमें यात्रियों के बचने की संभावना बेहद कम होती है।
हालांकि, इतिहास गवाह है कि हर बड़ी दुर्घटना के बाद विमानन क्षेत्र में तकनीकी सुधार और सख्त नियम लागू किए गए, जिससे आने वाली उड़ानों को पहले से कहीं ज़्यादा सुरक्षित बनाया जा सके। आइए नज़र डालते हैं उन 13 चर्चित विमान दुर्घटनाओं पर, जिन्होंने एविएशन इंडस्ट्री की दिशा और दशा हमेशा के लिए बदल दी।
ग्रैंड कैन्यन एयर कोलिजन: 30 जून 1956 को ग्रैंड कैन्यन के ऊपर उड़ान भर रहे दो विमान आपस में टकरा गए। उस समय ज़मीन से विमानों की निगरानी के लिए पर्याप्त तकनीक मौजूद नहीं थी, जिसके चलते यह हादसा हुआ। इस त्रासदी के बाद अमेरिका में फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन (FAA) की स्थापना की गई और रडार सिस्टम को आधुनिक बनाया गया। आज विमानों में टकराव से बचाव के लिए TCAS जैसी उन्नत प्रणाली मौजूद है, जो पायलट को आसपास उड़ रहे दूसरे विमानों की सटीक जानकारी देती है।
यूनाइटेड एयरलाइंस फ्लाइट 173: 28 दिसंबर 1978 को यूनाइटेड एयरलाइंस की फ्लाइट 173 एक छोटी तकनीकी समस्या में उलझी रही। पायलट उस खराबी को ठीक करने पर इतना केंद्रित हो गया कि ईंधन की स्थिति पर ध्यान नहीं दिया और क्रू मेंबर्स की चेतावनियों को नजरअंदाज कर दिया। नतीजा यह हुआ कि विमान का ईंधन खत्म हो गया। इस हादसे के बाद कॉकपिट रिसोर्स मैनेजमेंट (CRM) की शुरुआत हुई, जिसमें पायलटों को टीमवर्क और क्रू की राय को गंभीरता से लेने की ट्रेनिंग दी जाने लगी।
एयर कनाडा फ्लाइट 797: 2 जून 1983 को 33,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ रहे एयर कनाडा फ्लाइट 797 के टॉयलेट में आग लग गई। धुएं ने केबिन को इस कदर भर दिया कि यात्रियों को बाहर निकलने का मौका नहीं मिल सका। इस दर्दनाक घटना के बाद विमानों के टॉयलेट में स्मोक डिटेक्टर और ऑटोमैटिक फायर एक्सटिंग्विशर अनिवार्य कर दिए गए। साथ ही, फर्श पर रोशनी देने वाली स्ट्रिप्स लगाई गईं ताकि घने धुएं में भी रास्ता दिख सके।
डेल्टा एयरलाइंस फ्लाइट 191: 2 अगस्त 1985 को डलास के फोर्ट वर्थ एयरपोर्ट पर लैंडिंग के दौरान डेल्टा एयरलाइंस फ्लाइट 191 अचानक तेज़ नीचे की ओर बहने वाली हवा (विंड शीयर) की चपेट में आ गई और दुर्घटनाग्रस्त हो गई। इस हादसे के बाद विमानों में फॉरवर्ड-लुकिंग रडार लगाए जाने लगे, जो पायलटों को पहले ही खतरनाक मौसम की चेतावनी दे देते हैं।
यूनाइटेड एयरलाइंस फ्लाइट 232: 19 जुलाई 1989 को डेनवर से शिकागो जा रही यूनाइटेड एयरलाइंस फ्लाइट 232 के पिछले इंजन का पंखा फट गया, जिससे पूरा हाइड्रोलिक सिस्टम फेल हो गया और विमान नियंत्रण से बाहर हो गया। इस घटना के बाद इंजन निरीक्षण के नियम बदले गए और नए विमानों में अतिरिक्त बैकअप सेफ्टी सिस्टम जोड़े गए।
अलोहा एयरलाइंस फ्लाइट 243: 28 अप्रैल 1988 को हवाई में हिलो से होनोलूलू जा रहे एक पुराने बोइंग 737 की उड़ान के दौरान विमान की छत का बड़ा हिस्सा उड़ गया। 19 साल पुराने इस विमान की धातु कमजोर हो चुकी थी। इसके बाद ‘एजिंग एयरक्राफ्ट प्रोग्राम’ शुरू किया गया, जिसके तहत पुराने विमानों की गहन जांच अनिवार्य कर दी गई।
यूएस एयरवेज फ्लाइट 427: 8 सितंबर 1994 को पिट्सबर्ग में लैंडिंग के दौरान यूएस एयरवेज फ्लाइट 427 का रडर अचानक जाम हो गया, जिससे बोइंग 737 असंतुलित होकर बाईं ओर झुक गई। इस हादसे के बाद बोइंग ने हजारों विमानों के रडर सिस्टम में बदलाव किए और नए सेफ्टी पार्ट्स लगाए।
वैल्यूजेट फ्लाइट 592: 11 मई 1996 को मियामी के पास एवरग्लेड्स क्षेत्र में वैल्यूजेट फ्लाइट 592 के कार्गो होल्ड में रखे रासायनिक पदार्थों से आग लग गई। इस त्रासदी के बाद विमानों के कार्गो हिस्सों में भी स्मोक डिटेक्टर और फायर सप्रेशन सिस्टम अनिवार्य किए गए, साथ ही खतरनाक सामान ढोने के नियम सख्त हुए।
टीडब्ल्यूए फ्लाइट 800: 17 जुलाई 1996 को न्यूयॉर्क के जेएफके एयरपोर्ट से पेरिस जा रही TWA फ्लाइट 800 के ईंधन टैंक में इलेक्ट्रिक स्पार्क के कारण भीषण विस्फोट हुआ और विमान हवा में ही टूट गया। इसके बाद फ्यूल टैंकों में नाइट्रोजन गैस डालने की तकनीक विकसित की गई, जिससे विस्फोट का खतरा कम हो सके।
स्विसएयर फ्लाइट 111: 2 सितंबर 1998 को न्यूयॉर्क से जिनेवा जा रही स्विसएयर फ्लाइट 111 में इन-फ्लाइट एंटरटेनमेंट सिस्टम के शॉर्ट सर्किट से आग फैल गई। इस हादसे के बाद विमानों में इस्तेमाल होने वाली वायरिंग को अग्निरोधी सामग्री से ढकना अनिवार्य कर दिया गया।
एयर फ्रांस 447: 1 जून 2009 को रियो डी जनेरियो से पेरिस जा रही एयर फ्रांस फ्लाइट 447 में स्पीड मापने वाले सेंसर जाम हो गए, जिससे ऑटोपायलट ने काम करना बंद कर दिया। पायलट स्थिति को सही ढंग से संभाल नहीं पाए। इसके बाद पायलट ट्रेनिंग में मैन्युअल फ्लाइंग स्किल्स पर ज़्यादा ज़ोर दिया जाने लगा।
मलेशिया एयरलाइंस फ्लाइट 370: 8 मार्च 2014 को कुआलालंपुर से बीजिंग जा रही मलेशिया एयरलाइंस की फ्लाइट 370 रहस्यमय तरीके से लापता हो गई और आज तक उसका कोई ठोस सुराग नहीं मिल सका। इस घटना के बाद विमानों के लिए रियल-टाइम ट्रैकिंग सिस्टम को अनिवार्य किया गया, ताकि समुद्र के ऊपर भी उनकी लोकेशन लगातार पता चल सके।


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