26 जनवरी: एक दिन का गणतंत्र, 365 दिन की ज़िम्मेदारी — जो हम भूलते जा रहे हैं

26 जनवरी आते ही देश अचानक बहुत देशभक्त हो जाता है।

DP बदल जाती है, स्टेटस में तिरंगा लहराता है, “Happy Republic Day INDIA” हर जगह दिखता है।
लेकिन 27 जनवरी को क्या होता है?

तिरंगा नीचे आ जाता है, संविधान फिर से अलमारी में चला जाता है और नागरिक होने की ज़िम्मेदारी “busy life” के बहाने टल जाती है।

आज गणतंत्र दिवस celebration ज़्यादा बन गया है, और contemplation कम।
हम परेड देखते हैं, लेकिन यह नहीं पूछते कि जिन अधिकारों की वजह से परेड हो रही है, वे ज़मीन पर कैसे निभाए जा रहे हैं। हम संविधान का सम्मान करते हैं—लेकिन सिर्फ़ भाषणों और पोस्टर तक।

 

Concept of Rights and Duties Under Jurisprudence - iPleaders

 

सच यह है कि हम rights तो याद रखते हैं, duties भूल गए हैं।
Free speech चाहिए, लेकिन criticism सुनने की सहनशक्ति नहीं है।
Equality की बात करते हैं, लेकिन अपने bias छोड़ने को तैयार नहीं।
देश से प्यार दिखाते हैं, लेकिन नियमों और दूसरों के अधिकारों से समझौता कर लेते हैं।

Gen Z की भाषा में कहें तो—
हमने Democracy को festival mode पर डाल दिया है, daily-use mode से हटा दिया है।

गणतंत्र सिर्फ़ सरकार का काम नहीं है।
यह उस नागरिक से शुरू होता है जो fake news शेयर करने से पहले रुकता है,
जो online hate को “normal” नहीं मानता,
जो vote को “optional” नहीं समझता,
और जो सवाल पूछने से डरता नहीं।

 

Fixing India's electoral rolls

 

26 जनवरी हमें याद दिलाने आता है कि आज़ादी कोई one-day celebration नहीं, बल्कि रोज़ की ज़िम्मेदारी है।
अगर हम सिर्फ़ celebrate करेंगे और सवाल नहीं पूछेंगे,
तो गणतंत्र धीरे-धीरे एक तारीख़ बनकर रह जाएगा—एक जीवित व्यवस्था नहीं।

 

Our Responsibilities as citizens of India

 

शायद अब वक़्त है खुद से पूछने का—
क्या हम सिर्फ़ 26 जनवरी के नागरिक हैं, या 365 दिन के?

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