ग़ुलाम मुर्तज़ा राही की वो ग़ज़लें जो चुरा लेंगी आपका दिल...!

यूँ तो हिंदी-उर्दू साहित्य के जगत में अनेकों लेखक, कवि, शायर, गीतकार, ग़ज़लकार हैं जिन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से विभिन्न भावों, प्रभावों एवं स्वभावों को लिपिबद्ध किया है। वहीं कई ऐसे भी कलमकार हैं जिन्होंने अपनी लेखनी से ऐसे लफ़्ज़ों को कागज़ के सीने पर उकेरा है जिन्हें पढ़ या सुन कर दिल को सुकून तो महसूस होता है। साथ ही अपने भीतर छुपी हुई उस गहराई में उतरने का भी अवसर मिलता है, जिसमें हमें आनंद की अनुभूति होती है। सिर्फ इतना ही नहीं, बल्कि उन रचनाओं को पढ़ या सुन कर लगता है कि जैसे ये तो बस मेरे ही दिल की बात थी, जो मैं कहना, बताना या जताना चाहता था। हमें ये एहसास होता है कि हमारे जज़्बात को कलमकार ने अपने शब्दों में अभिव्यक्ति प्रदान कर दी है। आज एक ऐसे ही शायर की कुछ ग़ज़लों को आपने सामने पेश कर रहे हैं, जिनकी पैदाइश फतेहपुर में हुई और फिर उनकी लेखनी का प्रकाश आगे चल कर हर ओर बिखरा। जी हाँ हम बात कर रहे हैं उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में जन्मे ग़ुलाम मुर्तज़ा राही की। आज हम आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं ग़ुलाम मुर्तज़ा राही की कुछ चुनिंदा ग़ज़लें, जो आपको आपसे रूबरू करवाती हैं...।
आगे आगे शर फैलाता जाता हूँ,
पीछे पीछे अपनी ख़ैर मनाता हूँ।
पत्थर की सूरत बे-हिस हो जाता हूँ,
कैसी कैसी चोंटे सहता रहता हूँ।
आख़िर अब तक क्यूँ तुम्हें आया मैं नज़र,
जाने कहाँ कहाँ तू देखा जाता हूँ।
साँसों के आने जाने से लगता है,
इक पल जीता हूँ तो इक पल मरता हूँ।
दरिया बालू मोरम ढो कर लाता है,
मैं उस का सब माल आड़ा ले आता हूँ।
अब तो मैं हाथों में पत्थर ले कर अभी,
आईने का सामना करते डरता हूँ।।
जो मुझ पे भारी हुई एक रात अच्छी तरह,
तो फिर गुज़र भी गए सानेहात अच्छी तरह।
मैं बार बार गिराया गया बुलंदी से,
मुझे तो हो गया हासिल सबात अच्छी तरह।
किताब सा मिरा चेहरा तिरी निगाह में है,
बयान कर मिरी ज़ात ओ सिफ़ात अच्छी तरह।
तू अपने सीने से मुझ को यूँ ही लगाए रख,
समझ लूँ ता-कि तिरे दिल की आत अच्छी तरह।
तुझे बनाया गया है जो अशरफ़ुल-मख़्लूक़,
समो के ज़ात में रख काइनात अच्छी तरह।
किसी ने ज़हर मिला कर ने दे दिया हो तुझे,
मैं चख तो लूँ तिरे क़ंद ओ नबात अच्छी तरह।।
नायाब चीज़ कौन सी बाज़ार में नहीं,
लेकिन मैं उन के चंद ख़रीदार में नहीं।
छू कर बुलंदियों को पलटना है अब मुझे,
खाने को मेरे घास भी कोहसार में नहीं।
आता था जिस को देख के तस्वीर का ख़याल,
अब तो वो कील भी मिरी दीवार में नहीं।
इरफ़ान-ओ-आगही की ये हम किस हवा में हैं,
जुम्बिश तक उस के पर्दा-ए-असरार में नहीं।
उगला सा मुझ में शौक़-ए-शहादत नहीं अगर,
पहली सी काट भी तिरी तलवार में नहीं।।
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