ऐसी रचना जो चौराहे के एक अलग रूप को दर्शा रही है

चौराहे के नाम लेते ही हम सभी की मन की दृष्टि में आगे चहल-पहल और खुशनुमा माहौल घूमने लगता है ,लेकिन क्या कभी सोचा है कि उस चहल-पहल वाले चौराहे के एक कोने उदासियों का घिरा होता है ,एक कोने बैठी सब्जी बेच रही महिला के लिए ये चहल-पहल कुछ मायने ही नहीं रखती उसके लिए अगर कुछ मायने रखता है तो वो होता है उसके खरीदार ,ठीक इसी तरह गुब्बरे बेचने वाले बच्चो के साथ भी होता है ऐसे ही बहुत से लोगों होते है जिनके चेहरें की उदासियों को चौराहे की चमक कम कर पाने असमर्थ होती है .ऐसे ही लोगो की जिन्दगी की दांस्ता को बयाँ करती हुई मेरी ये रचना
भीड़ भाड़ वाले चौराहे पर
रंगबिरंगे गुब्बारे बेचने वाले उस मासूम से बच्चे की
जिंदगी में झाँक कर देखो कभी ,
तो पता चलेगा कि कितना खालीपन भरी और बेरंग है
उसकी जिंदगी !
चौराहे पर ताजी हरी भरी सब्जियां बेचने वालीं
उस महिला की आंखों में झाँक कर देखना कभी,
पता चलेगा कि कितनी बंजर भरी है उसकी जिंदगी।
सर्कस में लोगों को अपनी मजेदार बातों से हंसाने वाले
उस जोकर की जिंदगी में झाँक कर देखना कभी,
पता चलेगा कि कितनी उदासियों से भरी है उसकी जिंदगी!
रंग बिरंगे महकते फूलों को बेचने वाली
उस मासूम सी लड़की की जिंदगी में झाँक कर देखना कभी,
पता चलेगा कि कितने कांटों से भरी है उसकी जिंदगी।
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