मन के अंदर चल रहे अंतरयुद्ध से लड़ रहे इंसान के दर्द को बयां करती हृदयस्पर्शी रचना

जब इंसान दुखी हतास या निराश होता है या जब उसे सबसे अधिक किसी इंसान की जरूरत होती है तब वह अकेला ही होता है .कहने को तो सब पास होते है पर वास्तव में कोई साथ नही होता है , पास तो सब होते है पर साथ नही . मन के अंदर चल रहे अंतरयुद्ध से व्यक्ति को स्वयं ही लड़ना होता है .और खुद ही इस लड़ाई में जीत हासिल करके एक नई जिन्दगी की शुरुआत करनी पड़ती है .इंसान के इन्ही मनोदशा को बयां कर रही है मेरी ये रचना. हम उम्मीद करते है कि आपको जरूर पसंद आयेगी
कहने को सब पास होते है,
पर बुरे वक्त में ,
सब साथ छोड़ देते हैं!
सूख जाते है
आंसू यूं ही आंखों में
पर उसकी खबर
लेने वाला कोई नहीं होता है!
टूट जाती हैं ,
जब सारी उम्मीदे तो
अपने भी मुंह मोड़ लेते है!
बंद हो जाते है
जब सारे रास्ते,
तो खुद ही रास्ते बनाने पड़ते है!
बुझी हुई उम्मीदों में
खुद ही आशाओं के
दिये जलाने पड़ते है!
पांव में पडे़ छाले को
खुद ही मरहम लगाने पड़ते है!
कहने को सब पास होते है
पर पास होकर भी
बहुत दूर होते है!
अंधेरे में तो खुद के साये भी
साथ छोड़ देते हैं
अकेले ही लड़नी होती है
हर लड़ाई लोगों का सैलाब
तो जीतने के बाद उमड़ता है!
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