लाल टोपी छोड़ नीले रंग में अखिलेश! 2027 से पहले सपा का बड़ा सियासी दांव
उत्तर प्रदेश की राजनीति में अगर कोई कहे कि समाजवादियों का लाल रंग अचानक नीले में बदलने लगा है, तो चौंकिएगा मत! क्योंकि 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात पर सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने एक ऐसा सियासी दांव चल दिया है, जिसने विरोधियों की नींद उड़ा दी है। जी हां जिस समाजवादी पार्टी की पहचान अब तक 'लाल टोपी' और लाल-हरे गमछे से होती थी, अब उसी पार्टी की छात्र इकाई यानि 'समाजवादी छात्र सभा' का रंग-रूप पूरी तरह बदलने जा रहा है। नीली जींस, नीली टी-शर्ट और नीले गमछे के साथ सपा मैदान में उतरने की तैयारी कर चुकी है। अखिलेश यादव का यह कदम सिर्फ कपड़ों या रंगों का बदलाव नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश की सियासत में PDA के 'D' यानी दलित वोट बैंक को हमेशा-हमेशा के लिए अपने पाले में खींचने की एक सोची-समझी सियासी बिसात है! आज की इस खास रिपोर्ट में समझेंगे अखिलेश यादव के नीले दांव की पूरी कहानी...
जाहिर है समाजवादी पार्टी की पहचान लंबे समय से लाल टोपी, लाल-हरे गमछे और समाजवादी झंडे से जुड़ी रही है। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। लखनऊ में पार्टी की बैठक के दौरान अखिलेश यादव और शिवपाल सिंह यादव नीले गमछे में नजर आए। और इसके बाद समाजवादी पार्टी की छात्र सभा के लिए नीले रंग का ड्रेस कोड तय किए जाने की चर्चा ने यूपी की सियासत को गरमा दिया। अब छात्र सभा के पदाधिकारी और कार्यकर्ता...नीली शर्ट-नीली पैंट...या...नीली जींस-नीली टी-शर्ट में नजर आएंगे। खास बात ये है कि इस पोशाक पर समाजवादी छात्र सभा का लोगो और पार्टी का चुनाव निशान साइकिल भी होने की बात सामने आई है। यानी रंग नीला...लेकिन पहचान साइकिल की! वहीं अब आते हैं सबसे बड़े सवाल पर कि अखिलेश यादव ने नीला रंग ही क्यों चुना? दरअसल उत्तर प्रदेश की राजनीति में रंगों का अपना अलग सियासी मतलब रहा है। नीला रंग लंबे समय से दलित राजनीति और आंबेडकरवादी आंदोलन से जुड़ा माना जाता है।
बहुजन समाज पार्टी की राजनीतिक पहचान भी नीले रंग से गहराई से जुड़ी रही है। आजाद समाज पार्टी भी नीले रंग को अपनी राजनीतिक पहचान का हिस्सा बनाती रही है। वहीं दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी...लाल और हरे रंग के साथ पहचानी जाती रही है। ऐसे में सपा का छात्र संगठन अगर नीले रंग की पोशाक में उतरता है...तो सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अखिलेश यादव अब लाल के साथ नीले को भी अपनी सियासी पहचान का हिस्सा बनाने जा रहे हैं?
आपको बता दें अखिलेश यादव पिछले कुछ सालों से अपने पुराने यादव-मुस्लिम समीकरण से आगे बढ़कर दलित वोटरों के बीच पैठ बनाने की कोशिश कर रहे हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के फॉर्मूले को जोर-शोर से आगे बढ़ाया। इस रणनीति से पार्टी को चुनाव में फायदा भी मिला। अब 2027 विधानसभा चुनाव के लिए अखिलेश यादव इसी फॉर्मूले को और मजबूत करना चाहते हैं। लेकिन इस बार खास नजर है...
PDA के D यानी दलित वोट बैंक पर। क्योंकि अगर पिछड़े और अल्पसंख्यक के साथ दलित वोट का बड़ा हिस्सा भी सपा के साथ जुड़ गया, तो उत्तर प्रदेश की चुनावी गणित में बड़ा बदलाव हो सकता है। हालांकि सपा सिर्फ रंगों के भरोसे नहीं है, बल्कि ज़मीन पर भी घेराबंदी कर रही है। राज्य के करीब 26,000 प्राइमरी स्कूलों के बंद होने और सरकारी शिक्षा व्यवस्था की बदहाली को लेकर सपा जगह-जगह 'PDA पाठशालाएं' लगा रही है। हाल ही में अखिलेश यादव की मुलाकात कॉकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ता आशुतोष रांका से भी हुई थी। वहीं दूसरी तरफ सपा के इस नीले अवतार को देखकर सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने तुरंत मोर्चा खोल दिया है। बीजेपी ने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि केवल कपड़ों या झंडों का रंग बदल लेने से सपा का दलित विरोधी इतिहास नहीं छिप सकता। बीजेपी ने पूर्व सपा नेता आजम खान की डॉ. भीमराव आंबेडकर पर की गई पुरानी विवादित टिप्पणियों का जिक्र करते हुए तंज कसा कि "रंग बदलने से सपा के कर्मों के दाग नहीं धुलने वाले। यह सिर्फ चुनाव से पहले दलितों को छलने की एक और कोशिश है।"
कुल मिलाकर देखा जाए तो उत्तर प्रदेश की राजनीति अब एक बेहद दिलचस्प मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है। लाल टोपी के साथ नीला गमछा और नीली टी-शर्ट पहनकर अखिलेश यादव ने बसपा के पारंपरिक किले में सीधी सेंधमारी कर दी है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या नीले रंग का यह नया सियासी चोला समाजवादी पार्टी को 2027 में सत्ता के सिंहासन तक पहुंचा पाएगा? क्या दलित युवा और जेन-जी अखिलेश के इस 'ब्लू कार्ड' को स्वीकार करेंगे, या फिर बीजेपी और बसपा सपा के इस दांव को नाकाम कर देंगे? जवाब चाहे जो भी हो, लेकिन इतना तो तय है कि लाल और नीले के इस अनोखे संगम ने यूपी की चुनावी जंग में जबरदस्त गरमाहट ला दी है!
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