टिकट नहीं मिला तो सपा में आओ? अखिलेश के बयान से यूपी की सियासत गरम
उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन सियासी दलों ने अपनी तैयारी तेज कर दी है। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव भी इस बार कोई कसर छोड़ना नहीं चाहते। उनकी नजर सिर्फ अपने पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं पर नहीं है, बल्कि अब दूसरे दलों के उन नेताओं पर भी है, जो अपने इलाके में मजबूत पकड़ रखते हैं और चुनाव जीतने की ताकत रखते हैं। जी हां अखिलेश यादव ने ऐसा संकेत दिया है, जिसने यूपी की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। उन्होंने कहा है कि जो नेता कभी गठबंधन के सहारे चुनाव जीत चुके हैं और अगर अगली बार उन्हें टिकट नहीं मिलता, तो समाजवादी पार्टी ऐसे नेताओं पर विचार कर सकती है। यानी जो नेता आज दूसरे खेमे में हैं, कल समाजवादी पार्टी के साथ दिखाई दे सकते हैं। ऐसे में सवाल ये है कि अखिलेश आखिर ऐसा क्यों कर रहे हैं? क्या 2027 के लिए सपा अपने पुराने तरीके से आगे बढ़ने के बजाय नए चेहरों को जोड़ना चाहती है? आइए समझते हैं अखिलेश यादव के इस नए चुनावी दांव की पूरी कहानी...
दरअसल, 2 सितंबर को अखिलेश यादव सहारनपुर पहुंचे थे। इसी दौरान उन्होंने कहा कि जो लोग कभी गठबंधन के सहारे चुनाव जीते हैं और अगर उन्हें अगली बार टिकट नहीं मिलता है, तो समाजवादी पार्टी ऐसे नेताओं पर विचार कर सकती है। अखिलेश ने यह भी कहा कि जो लोग समाजवादी पार्टी में आएंगे, उन्हें सम्मान दिया जाएगा।
वहीं अब अखिलेश के इस बयान के कई मतलब निकाले जा रहे हैं। सीधी भाषा में समझें तो सपा अब सिर्फ यह नहीं देखेगी कि कोई नेता पहले से पार्टी में है या नहीं। पार्टी यह भी देख सकती है कि किसी नेता की अपने इलाके में कितनी पकड़ है और वह चुनाव जीत सकता है या नहीं। यानी अगर कोई नेता दूसरे दल में है, लेकिन अपने इलाके में उसका अच्छा असर है और वह चुनाव जीतने की ताकत रखता है, तो सपा उसे अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर सकती है। जाहिर है राजनीति में समीकरण कभी एक जैसे नहीं रहते। जो नेता आज बीजेपी या उसके सहयोगी दल के साथ खड़ा है, जरूरी नहीं कि चुनाव के वक्त भी वहीं रहे। मान लीजिए किसी मजबूत नेता को उसकी पार्टी अगली बार टिकट नहीं देती। ऐसे में उसके सामने दूसरा रास्ता खुल सकता है और अखिलेश यादव का बयान ऐसे नेताओं को सीधा संकेत देता है कि सपा में उनके लिए जगह हो सकती है। यानी 2027 में सपा का एक बड़ा ध्यान ऐसे उम्मीदवारों पर हो सकता है, जिनके पास अपने इलाके में जीतने की ताकत हो।
आपको बता दें समाजवादी पार्टी लंबे समय से PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग के समीकरण पर जोर देती रही है। अब इसी के साथ अखिलेश यादव ऐसे चेहरों को भी जोड़ना चाहते हैं, जो अपने इलाके में चुनाव जीतने की क्षमता रखते हों। यही वजह है कि दूसरे दलों के ऐसे नेताओं पर भी सपा की नजर हो सकती है, जिनका अपने इलाके में अच्छा प्रभाव है। अब सवाल यह है कि अगर दूसरे दलों के मजबूत नेताओं को सपा में लाया जाता है और उन्हें टिकट दिया जाता है, तो पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं का क्या होगा? क्योंकि सपा में हर सीट पर पहले से कई नेता टिकट की तैयारी कर रहे हैं। कई कार्यकर्ता सालों से पार्टी के लिए काम कर रहे हैं और उन्हें उम्मीद है कि चुनाव आने पर पार्टी उन्हें मौका देगी। ऐसे में अगर अचानक कोई बाहरी नेता पार्टी में आता है और उसे टिकट मिल जाता है, तो पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं में नाराजगी हो सकती है। यही अखिलेश यादव के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी।
देखा जाए तो 2027 के चुनाव से पहले अखिलेश यादव ने अपनी रणनीति का एक पन्ना खोल दिया है। लेकिन असली सवाल अब यही है कि अखिलेश का यह दांव कितना कामयाब होता है? क्या दूसरे दलों से आने वाले नेता सपा को ज्यादा सीटें जिता पाएंगे? क्या इन नेताओं के आने से सपा का चुनावी समीकरण और मजबूत होगा? क्योंकि 2027 की लड़ाई सिर्फ नेताओं की नहीं होगी...हर सीट पर मुकाबला होगा, हर वोट मायने रखेगा और हर मजबूत चेहरा चुनाव का रुख बदल सकता है। ऐसे में अब देखना होगा कि 2027 की जंग में कौन-कौन नेता सपा के साथ आता है और कौन अपनी सियासी बाजी पलटता है।
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