2027 से पहले अखिलेश का नया दांव! बौद्ध वोटों पर नजर, BJP ने खोला पुराना हिसाब
चुनाव की आहट सुनते ही राजनेताओं के सुर बदलने लगते हैं। ऐसा ही कुछ इन दिनों समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ भी हो रहा है। वह इन दिनों लगभग रोज जनता से लुभावने वादे कर रहे हैं और इसी कड़ी में उन्होंने यह भी ऐलान कर दिया है कि सत्ता में आने पर वह बौद्ध तीर्थस्थलों का विकास करेंगे। लेकिन सवाल यह उठता है कि जिस पार्टी का इतिहास ही बौद्ध विरोध और तुष्टिकरण से भरा रहा हो, उसकी जुबान पर ऐसे वादे कितने फबते हैं? उत्तर प्रदेश की जनता और खासकर दलित-शोषित समाज को यह सोचना होगा कि चुनावी भाषणों के जाल में फंसने से पहले सपा के उस काले अतीत को याद किया जाए, जिसके जख्म आज भी हरे हैं। वहीं दूसरी तरफ बीजेपी अपने शासनकाल में अयोध्या, काशी, विंध्याचल और कुशीनगर के विकास के साथ-साथ बुद्धिस्ट सर्किट को लेकर किए गए कामों को सामने रख रही है।
यानी 2027 की लड़ाई अब सिर्फ वोट और सीटों की नहीं है...बल्कि विरासत, पहचान, धार्मिक पर्यटन और सामाजिक न्याय के मुद्दे भी चुनावी हथियार बनते दिखाई दे रहे हैं। आइए समझते हैं पूरी सियासी कहानी...
दरअसल, अखिलेश यादव मार्च 2012 में यूपी की गद्दी पर बैठे थे और कुछ ही महीनों के भीतर उनकी सरकार का असली चेहरा सामने आ गया। तारीख थी 17 अगस्त 2012। लखनऊ की टीले वाली मस्जिद में अलविदा की नमाज के बाद एक सुनियोजित भीड़ बाहर निकली। हाथों में रोहिंग्या मुसलमानों के समर्थन में तख्तियां और जुबान पर जहर। यह भीड़ सीधे बुद्धा पार्क की तरफ बढ़ी। पुलिस चुपचाप तमाशा देखती रही क्योंकि वह अखिलेश सरकार की तुष्टिकरण नीति से अच्छी तरह वाकिफ थी। अराजकता पर उतारू इस भीड़ ने बुद्धा पार्क पर धावा बोल दिया। भगवान बुद्ध की पवित्र प्रतिमा पर चढ़कर उसे तहस-नहस कर दिया गया। बौद्ध प्रतीकों और आसपास की दुकानों को तोड़ डाला गया। मामला यहीं नहीं थाम, उग्र भीड़ ने बौद्ध भिक्षु भंते श्री अशोकानंद जी और उनके शिष्यों पर जानलेवा हमला कर दिया। उनके भगवा वस्त्रों से नफरत करने वाले इन उपद्रवियों ने भंते जी के कपड़े फाड़ दिए, उन्हें बुरी तरह पीटा और उनकी तीन गाड़ियां चकनाचूर कर दीं। यह सब क्यों हुआ? क्योंकि उस समय म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों द्वारा फैलाए जा रहे दंगों और वहां के बौद्धों के आत्मरक्षात्मक संघर्ष को लेकर मुसलमानों के बीच जमकर जहर उगला गया था। आग भड़की म्यांमार में, और उसकी तपिश में लखनऊ में बौद्धों और बुद्ध की मूर्तियों को निशाना बनाया गया।
वहीं हजरतगंज के दिल को दहला देने वाली इस घटना के बाद भंते अशोकानंद जी ने थाना हजरतगंज में मुकदमा दर्ज कराया। लेकिन अखिलेश सरकार ने दंगाइयों के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय उन्हें खुली छूट दे दी। जिसके बाद दंगाई तोड़फोड़ करते हुए सीधे विधानसभा मार्ग तक पहुंच गए। आपको बता दें उत्तर प्रदेश के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि एक बेकाबू भीड़ ने संवेदनशील इलाकों में तांडव मचाया और पुलिस उनके आगे-आगे हाथ जोड़े घूमती रही। दंगाइयों पर NSA तो दूर, सामान्य IPC की धाराओं में भी शिकंजा नहीं कसा गया। क्यों? क्योंकि वे दंगाई मुस्लिम वोटबैंक का हिस्सा थे। आपको बता दें अखिलेश यादव सिर्फ बौद्ध विरोधी ही नहीं, बल्कि दलितों और बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के महापुरुषों के प्रति भी अपनी नफरत छिपा नहीं पाए हैं। जी हां कन्नौज मेडिकल कॉलेज से बाबा साहेब का नाम चुपचाप हटा दिया गया। बाबा साहेब आंबेडकर ग्रीन गार्डेन का नाम बदलकर 'जनेश्वर मिश्रा पार्क' कर दिया गया। इतना ही नहीं 5 सितंबर 2016 को गाजियाबाद हज हाउस के कार्यक्रम में अखिलेश के चहेते मंत्री आजम खान ने सरेआम बाबा साहेब को भू-माफिया तक कहा था।
लेकिन शर्मनाक बात यह थी कि मंच पर बैठे अखिलेश यादव ने अपने मंत्री को रोकने के बजाय तालियां बजाईं। वहीं साल 2013 में एक लाख से ज्यादा दलित कर्मचारियों को डिमोट करने का पाप भी इसी अखिलेश सरकार ने किया था। लोकसभा में सपा सांसद द्वारा दलितों के प्रमोशन में आरक्षण का बिल तक फाड़वा दिया गया था। इसके उलट, आज उत्तर प्रदेश और देश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार सभी धर्मों का सम्मान करते हुए 'विरासत से विकास' के मंत्र को साकार कर रही है। अयोध्या का भव्य राममंदिर, काशी-विश्वनाथ कॉरिडोर, विंध्यवासिनी कॉरिडोर, कुशीनगर इंटरनेशनल एयरपोर्ट और बुद्धिस्ट सर्किट इसका जीता-जागता सबूत है।
वहीं हाल ही में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सिद्धार्थनगर के कपिलवस्तु से अंग्रेजों द्वारा ले जाए गए भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों की हांगकांग में होने वाली नीलामी को न सिर्फ रुकवाया गया, बल्कि उन्हें भारत लाकर दिल्ली के राय पिथौरा फोर्ट में पूरी शान से स्थापित भी कराया गया। लेकिन अखिलेश यादव इन जगहों पर कभी नहीं जाएंगे। न वे अयोध्या जाएंगे, न बुद्धस्थलों के सच्चे इतिहास को समझेंगे, क्योंकि उन्हें डर है कि उनका खास वोटबैंक नाराज न हो जाए। वहीं आज जब अखिलेश यादव चुनावी नईया पार करने के लिए बौद्ध तीर्थस्थलों के विकास के झूठे और मीठे सपने दिखा रहे हैं, तो जनता को उनके 2012 से 2017 तक के उस काले दौर को नहीं भूलना चाहिए, जब बौद्ध भिक्षुओं पर हमले हुए थे और बाबा साहेब का अपमान सरेआम हुआ था। इतिहास गवाह है कि जिनका एजेंडा सिर्फ और सिर्फ तुष्टिकरण रहा हो, वे आस्था और विकास के पैरोकार कभी नहीं बन सकते। दलित-शोषित समाज और बौद्ध अनुयायी सपा के इन ढोंगियों के बहकावे में आने वाले नहीं हैं। अतीत के इन गुनाहों का हिसाब जनता आने वाले चुनाव में जरूर लेगी!
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