2017 में चाचा के पास, अब भतीजे के हाथ! लोहिया ट्रस्ट की पूरी कहानी

समाजवादी पार्टी की सियासत में एक बार फिर लोहिया ट्रस्ट चर्चा के केंद्र में है...लेकिन इस बार वजह कोई बयान या विवाद नहीं...बल्कि ट्रस्ट की कमान में हुआ बड़ा बदलाव है। जिस लोहिया ट्रस्ट की कमान 2017 में मुलायम सिंह यादव ने शिवपाल यादव को सौंपी थी...करीब 9 साल बाद उसी ट्रस्ट की जिम्मेदारी अब अखिलेश यादव के हाथ में आ गई है।
जी हाँ, साइकिल की सवारी करने वाले अखिलेश यादव ने अब अपनी पार्टी और परिवार की पूरी विरासत पर ऐसा पक्का ताला लगा दिया है कि विरोधी भी देखते रह गए हैं! कभी चाचा शिवपाल के पास रहने वाली 'लोहिया ट्रस्ट' की महा-ताकत अब भतीजे अखिलेश यादव के हाथ में आ चुकी है। साल 2017 का वो घमासान तो आपको याद ही होगा, जब परिवार में जंग छिड़ी थी...लेकिन आज तस्वीर बिल्कुल बदल चुकी है! आखिर कैसे चाचा ने खुद अपने हाथ से भतीजे को सौंप दी ट्रस्ट की गद्दी? और क्यों बीजेपी कह रही है कि ये सिर्फ परिवारवाद का खेल है? आइए, इस पूरी फिल्मी कहानी को समझते है।

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव अब सिर्फ सपा के अध्यक्ष नहीं हैं...अब उनके हाथ में समाजवादी विचारधारा से जुड़े एक और बड़े संस्थान की कमान भी आ गई है। साल 2027 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले अखिलेश यादव ने समाजवादी आंदोलन की सबसे बड़ी वैचारिक और सियासी तिजोरी यानी 'लोहिया ट्रस्ट' की कमान अपने हाथों में ले ली है। आपको बता दें अब तक इस ट्रस्ट के अध्यक्ष साल 2017 से लगातार शिवपाल सिंह यादव थे। लेकिन हाल ही में हुई ट्रस्ट की बैठक में ऐसा खेल पलटा कि सभी 8 सदस्यों ने सर्वसम्मति से अखिलेश यादव को इसका नया अध्यक्ष चुन लिया। मजे की बात तो यह है कि इस फैसले पर खुद शिवपाल यादव ने भी अपनी मुहर लगाई है! वहीं इस बदलाव के साथ ही अखिलेश यादव ने पार्टी संगठन से लेकर वैचारिक संस्थाओं तक पर अपनी पकड़ एकदम मजबूत कर ली है। जरा गौर कीजिए कि अब अखिलेश के पास क्या-क्या आ चुका है। 

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष तो वे पहले से ही हैं।

जनेश्वर मिश्र ट्रस्ट की कमान भी पहले से अखिलेश के ही पास थी।

अब लोहिया ट्रस्ट के भी सर्वेसर्वा खुद अखिलेश यादव बन गए हैं।

यानी साफ है कि पार्टी की सियासत हो या फिर फंड और विचारधारा जुटाने वाले संस्थान, अब हर जगह सिर्फ और सिर्फ अखिलेश का ही सिक्का चलेगा! वहीं लोहिया ट्रस्ट में जो 8 सदस्य है, उनमें....

अखिलेश यादव
शिवपाल यादव
दीपक मिश्रा
आदित्य यादव
राम नरेश यादव
रामसेवक यादव
वीरपाल यादव
राजेश यादव

का नाम शामिल है। वहीं अब आपको करीब 9 साल पीछे ले चलते हैं...साल था 2017। समाजवादी पार्टी और यादव परिवार में वर्चस्व की लड़ाई अपने चरम पर थी। अखिलेश यादव और शिवपाल यादव के बीच पार्टी और संगठन को लेकर खुला टकराव था। मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव के बीच भी मतभेद सामने आ चुके थे। इसी दौर में लोहिया ट्रस्ट भी परिवार के भीतर शक्ति संतुलन का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया। उस वक्त मुलायम सिंह यादव ने प्रोफेसर रामगोपाल यादव को हटाकर शिवपाल सिंह यादव को लोहिया ट्रस्ट की जिम्मेदारी सौंप दी थी। यानी 2017 में लोहिया ट्रस्ट की कमान शिवपाल के पास चली गई। और इसके बाद करीब 9 साल तक शिवपाल इस ट्रस्ट के अध्यक्ष बने रहे। लेकिन वक्त बदला...राजनीति बदली...समाजवादी परिवार के रिश्ते बदले...और अब ट्रस्ट की तस्वीर भी बदल गई। आपको बता दें लोहिया ट्रस्ट कोई सामान्य संस्था नहीं है। इसका जुड़ाव समाजवादी आंदोलन और डॉ. राम मनोहर लोहिया की राजनीतिक विरासत से है। ट्रस्ट का उद्देश्य समाजवादी विचारधारा का प्रचार-प्रसार करना और सामाजिक बराबरी तथा शोषण-विहीन समाज की विचारधारा को आगे बढ़ाना रहा है। इस ट्रस्ट से समाजवादी आंदोलन के कई बड़े चेहरे जुड़े रहे हैं। जनेश्वर मिश्र...प्रोफेसर रामगोपाल यादव... और समाजवादी आंदोलन से जुड़े दूसरे दिग्गज। आपको बता दें इस ट्रस्ट की स्थापना समाजवादी पार्टी के गठन से भी पहले हुई थी। यही वजह है कि समाजवादी परिवार और पार्टी से जुड़े लोगों के बीच इस ट्रस्ट को सिर्फ एक संस्था नहीं बल्कि समाजवादी विरासत के एक अहम मंच के रूप में देखा जाता है।

वहीं अब सवाल है कि अखिलेश यादव के लिए लोहिया ट्रस्ट की अध्यक्षता इतनी खास क्यों है? तो आपको बता दें अखिलेश पिछले कुछ सालों से समाजवादी पार्टी की राजनीति को सिर्फ चुनावी लड़ाई तक सीमित नहीं रखना चाहते।
उनकी राजनीति में सामाजिक न्याय...PDA और समाजवादी विचारधारा का नैरेटिव लगातार दिखाई देता है। अब लोहिया ट्रस्ट की कमान उनके पास आने के बाद उनके पास समाजवादी आंदोलन की वैचारिक विरासत को सीधे अपने नेतृत्व से जोड़ने का एक और मंच होगा। यानी 2027 में अखिलेश के सामने सिर्फ बीजेपी को सत्ता से हटाने की चुनौती नहीं होगी...बल्कि वे चुनाव को इस नैरेटिव में भी बदलने की कोशिश कर सकते हैं कि एक तरफ समाजवादी विचारधारा और सामाजिक न्याय की राजनीति...दूसरी तरफ बीजेपी की राजनीति। लेकिन अब इस फैसले को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी शुरू हो गई है।

योगी सरकार में मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के प्रमुख ओम प्रकाश राजभर ने इस बदलाव को लेकर अखिलेश और शिवपाल के रिश्ते पर सवाल उठाए हैं। राजभर का दावा है कि अखिलेश यादव को शिवपाल यादव पर भरोसा नहीं है। राजभर ने शिवपाल के बीजेपी के साथ जाने और बाद में अलग पार्टी बनाने का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे राजनीतिक इतिहास के बाद अखिलेश के लिए शिवपाल पर पूरी तरह भरोसा करना आसान नहीं है। राजभर ने 2017 के दौर में शिवपाल की ओर से समाजवादी पार्टी और उसके नेतृत्व को लेकर दिए गए पुराने बयानों का भी जिक्र किया। वहीं ट्रस्ट की कमान अखिलेश यादव के पास जाने से परिवारवाद का मुद्दा एक बार फिर खड़ा हो गया है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या लोहिया के नाम पर बने ट्रस्ट की कमान यादव परिवार में ही रहनी चाहिए? 

दरअसल, डॉ. राम मनोहर लोहिया समाजवादी राजनीति के बड़े विचारक थे। उनकी राजनीति में सामाजिक बराबरी, और आम आदमी की भागीदारी जैसे मुद्दे प्रमुख थे। वो परिवारवाद के पूरी तरफ खिलाफ थे। ऐसे में अखिलेश यादव को ट्रस्ट की कमान मिलना लोहिया की विचारधारा का कहीं न कहीं अपमान है। देखा जाए तो भले ही शिवपाल यादव को उस पद से हटा दिया गया हो लेकिन अखिलेश यादव पार्टी के दूसरे सदस्य को भी अध्यक्ष बना सकते थे। लेकिन अखिलेश ने अपने पिता मुलायम की परिवारवाद की परंपरा का पालन करते हुए खुद को ही उस पद पर काबिज कर लिया। 

तो कुल मिलाकर साफ है कि सियासत में कोई किसी का स्थाई दुश्मन या दोस्त नहीं होता! कल तक जो चाचा-भतीजे एक-दूसरे के आमने-सामने थे, आज वही एक मंच पर बैठकर पार्टी की विरासत को आगे बढ़ाने का दावा कर रहे हैं। अखिलेश यादव ने भले ही पार्टी और ट्रस्टों की चाबी अपने हाथ में लेकर अपनी स्थिति को लोहे जैसा मजबूत कर लिया हो, लेकिन 2027 के चुनावी दंगल में जनता इस परिवारवाद और जोड़-तोड़ के खेल पर क्या फैसला सुनाती है, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा! फिलहाल अखिलेश के इस फैसले ने 2017 से चली आ रही समाजवादी परिवार की पूरी राजनीतिक कहानी को फिर से चर्चा में ला दिया है। 

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