ऑल इंडिया मुस्लिम जमात की अखिलेश से मांग, 2027 में मुस्लिम को बनाएं CM चेहरा!

उत्तर प्रदेश की सियासत से आज एक बड़ी खबर सामने आई! समाजवादी पार्टी के सबसे मजबूत और पारंपरिक M-Y यानि मुस्लिम-यादव समीकरण के किले में एक ऐसा सियासी बम फूटा है, जिसने सीधे अखिलेश यादव की रातों की नींद उड़ा दी है। जी हां विधानसभा चुनाव के रण से ठीक पहले ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव को एक ऐसा संवेदनशील और बारूदी पत्र भेज दिया है, जिसने यूपी की राजनीति में भूचाल ला दिया है। मौलाना ने कोई घुमा-फिराकर बात नहीं की, बल्कि सीधे सपा के लेटरहेड पर अखिलेश यादव से मांग कर डाली है कि "2027 के चुनाव में सपा किसी मुस्लिम नेता को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करे!" मौलाना के इस 7% बनाम 22% वाले जनसंख्या के नए गणित ने अखिलेश यादव के सामने आगे कुआं, पीछे खाई जैसी भयंकर स्थिति पैदा कर दी है। क्या है पूरा मामला आइए आपको बताते हैं। 

मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने अपने पत्र और वीडियो बयान में बेहद आक्रामक और तीखे तेवर अख्तियार किए हैं। उन्होंने अखिलेश यादव को इतिहास का आईना दिखाते हुए साफ-साफ शब्दों में कहा कि उत्तर प्रदेश के लाखों-करोड़ों मुसलमानों के जज्बात अब पूरी तरह बदल रहे हैं। मुसलमानों ने हमेशा अपनी झोली भर-भरकर समाजवादी पार्टी को एकतरफा वोट दिया है। इसी मुस्लिम वोट बैंक के दम पर दिवंगत मुलायम सिंह यादव और खुद अखिलेश यादव कई बार सूबे के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे। इतना ही नहीं, मौलाना ने बेहद तल्ख लहजे में कहा कि मुस्लिम वोट बैंक की बदौलत ही अखिलेश के भाई, चाचा, पत्नी, भतीजे और उनके कुनबे के अन्य सदस्य विधानसभा और लोकसभा की सीढ़ियां चढ़ने में कामयाब रहे। अखिलेश के पूरे परिवार को राजनीति के शीर्ष पर पहुंचाने का काम मुसलमानों ने ही किया है, इसलिए सपा और यादव परिवार पर मुसलमानों का बहुत बड़ा एहसान है। लेकिन जब भी सत्ता में हिस्सेदारी या टिकट बंटवारे की बात आती है, तो मुस्लिम समाज को दरकिनार कर दिया जाता है। 

आपको बता दें अखिलेश यादव के लिए इस पत्र में सबसे दुखती रग पर हाथ रखा गया है, और वो है जनसंख्या का समीकरण। मौलाना बरेलवी ने सपा के कोर वोट बैंक का पूरा अंकगणित बिगाड़ते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में यादव बिरादरी की आबादी महज 7 प्रतिशत है, जबकि मुस्लिम समुदाय की आबादी 22 प्रतिशत है। लोकतांत्रिक व्यवस्था और संख्याबल के हिसाब से देखा जाए तो 22% वालों का हक 7% वालों से कहीं ज्यादा बनता है। इसलिए सपा को अब यह बड़ा एलान करना ही होगा कि 2027 का चुनाव जीतने के बाद यूपी की गद्दी पर अखिलेश यादव नहीं, बल्कि उनकी ही पार्टी का कोई काबिल मुस्लिम चेहरा बैठेगा। मौलाना ने यह भी साफ किया कि वह किसी खास व्यक्ति का नाम नहीं ले रहे हैं, बल्कि सपा के भीतर ही मौजूद किसी भी योग्य मुस्लिम नेता को आगे लाया जाना चाहिए और उसके चेहरे पर ही चुनाव लड़ा जाना चाहिए। 

दरअसल, मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने अखिलेश यादव को दो टूक अल्टीमेटम दे दिया है। उन्होंने कहा कि अगर अखिलेश यादव इस मांग को स्वीकार करते हैं, तभी सूबे का मुसलमान 2027 के चुनाव में सपा को जमकर और एकतरफा वोट देगा। लेकिन अगर वह ऐसा करने में नाकाम रहते हैं, तो फिर उन्हें मुसलमानों से उम्मीदें पूरी तरह छोड़ देनी चाहिए। मौलाना ने साफ चेतावनी दी कि साल 2022 के विधानसभा चुनाव में जिस जोश, जज्बे और जूनून के साथ मुसलमानों ने सपा का झंडा उठाया था और सपोर्ट किया था, वह जोश 2027 में रत्ती भर भी देखने को नहीं मिलेगा। चुनाव में महज 6 से 8 महीने का वक्त बचा है, ऐसे में अगर यह मांग मुस्लिम समाज के भीतर जोर पकड़ती है, तो अखिलेश यादव के लिए इसका जवाब देना नामुमकिन हो जाएगा। वहीं इस एक चिट्ठी ने समाजवादी पार्टी के सामने धर्मसंकट खड़ा कर दिया है। 

दरअसल, अगर अखिलेश यादव इस मांग को सिरे से खारिज करते हैं या अनसुना करते हैं, तो मुस्लिम समाज में यह कड़ा संदेश जाएगा कि सपा सिर्फ उनका इस्तेमाल वोट बैंक की तरह करती है। नतीजा यह होगा कि मुस्लिम वोट पूरी तरह बिखर जाएंगे और वे कांग्रेस या बसपा जैसे दूसरे विकल्पों की तरफ भागेंगे। दूसरी तरफ अगर अखिलेश यादव किसी मुस्लिम चेहरे को सीएम पद का उम्मीदवार घोषित कर देते हैं, तो ध्रुवीकरण के डर से उनका पारंपरिक गैर-यादव पिछड़ा वर्ग और हिंदू मतदाता वर्ग पूरी तरह छिटककर भारतीय जनता पार्टी के पाले में चला जाएगा। वहीं चुनाव से ठीक पहले इस तरह के दबाव के आगे झुकने से पार्टी के अंदर दूसरी जातियों जैसे कुर्मी, मौर्य, निषाद आदि से भी इसी तरह की मांगें उठने लगेंगी, जिससे टिकट बांटना और संगठन को संभालना अखिलेश के लिए असंभव हो जाएगा।

कुल मिलाकर देखा जाए तो मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी की इस चिट्ठी ने उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव से पहले ही सियासी माहौल में जबरदस्त तड़का लगा दिया है। यह सिर्फ एक मांग नहीं है, बल्कि अखिलेश यादव के सबसे भरोसेमंद MY समीकरण पर सीधा और तीखा प्रहार है। सपा ने अब तक जिस वोट बैंक को अपनी बपौती समझा था, आज वही 22% का हिस्सा अपना पूरा हक मांग रहा है। अब गेंद पूरी तरह अखिलेश यादव के पाले में है, अगर वो इस मांग को मानते हैं तो गैर-मुस्लिम वोटर नाराज, और अगर नहीं मानते तो मुस्लिम नाराज! ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि अखिलेश यादव इस सियासी चक्रव्यूह से निकलने के लिए कौन सा नया दांव चलते हैं, लेकिन एक बात तय है कि 2027 का यह चुनावी दंगल अब बेहद रोमांचक हो चुका है! 

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