अखिलेश यादव ने महिला आरक्षण को बताया 'काला दस्तावेज
आज लोकतंत्र के मंदिर यानी संसद से लेकर यूपी की गलियों तक सियासी पारा सातवें आसमान पर है! केंद्र सरकार ने आज एक ऐसा पत्ता फेंका जिसे वो 'नारी शक्ति' का सम्मान बता रही है, लेकिन विपक्ष इसे 'सियासी चक्रव्यूह' करार दे रहा है। जी हां, संसद में आज महिला आरक्षण बिल आज पेश हुआ। लेकिन बिल पेश होने से पहले समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने इसे बीजेपी का काला दस्तावेज और एक्सपायरी डेट वाली सरकार का आखिरी जुमला बताकर मोर्चा खोल दिया।
दरअसल, जैसे ही दिल्ली में महिला आरक्षण बिल की सुगबुगाहट तेज हुई, लखनऊ से अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर एक के बाद एक कई डिजिटल बम फोड़े। अखिलेश ने सीधे तौर पर इस बिल को बीजेपी की कुटिल राजनीति का मुखौटा करार दिया। उन्होंने इसे एक ऐसा काला दस्तावेज बताया जो दरअसल खुफिया लोगों की गुप्त योजना है। सपा प्रमुख का मानना है कि इस बिल के जरिए पिछड़े और दलित समाज की महिलाओं को हमेशा के लिए शक्तिहीन बनाने की गहरी साजिश रची गई है। अखिलेश यादव ने अपनी रणनीति साफ कर दी है।
उन्होंने कहा कि यह बिल दरअसल PDA की बढ़ती एकजुटता से घबराकर लाया गया है। अखिलेश के मुताबिक, यह बिल उन लोगों की हताशा से पैदा हुआ है जिनकी सोच सामंती और नारी विरोधी है। वहीं सपा मुखिया का सबसे बड़ा आरोप यह है कि बीजेपी इस बिल के बहाने जातिगत जनगणना कराने से भाग रही है। उनका कहना है कि अगर जनगणना हुई तो पिछड़ों के आंकड़े सामने आएंगे और आरक्षण की मांग बढ़ेगी, जिससे बीजेपी डरती है। उन्होंने सवाल उठाया कि बिना जनगणना और बिना परिसीमन के यह बिल सिर्फ एक जनविरोधी जुमला बनकर रह जाएगा, जो पिछड़ी और अल्पसंख्यक महिलाओं के हक को निगल जाएगा।
आपको बता दें सिर्फ अखिलेश ही नहीं, सपा के दिग्गजों ने भी मोर्चा संभाल लिया है। सांसद वीरेंद्र सिंह ने साफ कहा कि अगर नीयत साफ है तो ठीक, लेकिन बिल की आड़ में अगर कोई दूसरा खेल हुआ तो संसद में जोरदार बहस होगी। वहीं, बाबू सिंह कुशवाहा ने चुटकी लेते हुए कहा कि यह बिल तो 2021 की जनगणना के बाद आना था, फिर अचानक ऐसी क्या आफत आ गई कि सरकार इसे आनन-फानन में बिना तैयारी के ला रही है? यह जल्दबाजी ही बीजेपी की घबराहट का सबूत है।
वहीं मैनपुरी से सांसद डिंपल यादव ने भी इस महिला बिल का विरोध किया। डिंपल यादव ने बिल को लेकर कहा कि हम चाहते हैं कि जो परिसीमन का प्रयोग है, यह बिना जनगणना के हो रहा है। उन्होंने आगे कहा कि सरकार 20 साल पहले का डेटा परिसीमन में कैसे प्रयोग करेगी। यह अपने आप में सरकार की नीयत और नीति में खोट दर्शाता है।
देखा जाए तो सवाल उठ रहे हैं कि क्या महिला आरक्षण बिल वाकई आधी आबादी को हक दिलाने का जरिया बनेगा, या फिर यह सिर्फ 2027 के दंगल से पहले की एक बड़ी बिसात है? अखिलेश यादव ने तो इसे काला दस्तावेज बताकर आर-पार की जंग का ऐलान कर दिया है। एक तरफ बीजेपी का नारी शक्ति कार्ड है, तो दूसरी तरफ सपा का पीडीए वाला दांव। अब देखना होगा कि संसद के पटल पर आए इस बिल पर विपक्ष के कितने दल इसके परिसीमन वाले प्रावधानों पर सरकार को घेरते हैं और कितनी चिंगारियां निकलती हैं।

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