'समानता और भाईचारा' से 2027 की राह: सपा की रणनीति का ऐलान
यूपी की सियासत में साइकिल की रफ्तार अब हाईवे पर आ गई है! जी हां 29 मार्च की वो तारीख, जब गौतमबुद्धनगर की दादरी विधानसभा का मिहिर भोज डिग्री कॉलेज का मैदान सिर्फ एक मैदान नहीं, बल्कि समाजवादी पार्टी के लिए 2027 के लखनऊ सिंहासन का लॉन्चिंग पैड बन गया। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने समाजवादी समानता-भाईचारा रैली' के जरिए उस पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हुंकार भरी है, जिसे भाजपा का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता है। आपको बता दें यह सिर्फ एक रैली नहीं थी, बल्कि यह सीधे तौर पर प्रधानमंत्री मोदी के जेवर वार पर अखिलेश का दादरी पलटवार था। ढोल-नगाड़ों की थाप, गगनभेदी नारे और हजारों की भीड़ के बीच अखिलेश ने साफ कर दिया कि इस बार मुकाबला बराबरी का नहीं, बल्कि आर-पार का होगा।
आपको बता दें अखिलेश यादव ने रैली के लिए दादरी और राजा मिहिर भोज के नाम को चुनकर एक तीर से कई निशाने साधे हैं। सम्राट मिहिर भोज, जिन्होंने 9वीं शताब्दी में गुर्जर-प्रतिहार वंश का परचम लहराया, आज गुर्जर समाज की अस्मिता के सबसे बड़े प्रतीक हैं। खास बात ये है कि पश्चिमी यूपी के 32 जिलों की 140 सीटों पर गुर्जर समाज किंगमेकर है। ऐसे में सपा ने दिग्गज गुर्जर नेता राजकुमार भाटी को कमान सौंपकर यह संदेश दिया है कि सुशासन में अब पिछड़ों की असली हिस्सेदारी होगी। जिस प्रतिमा पर कालिख पोतने को लेकर विवाद हुआ था, उसी प्रतिमा पर माल्यार्पण कर अखिलेश ने गुर्जरों के सम्मान को सीधे सपा के झंडे से जोड़ दिया है। आपको बता दें मेरठ, बागपत, मुजफ्फरनगर से लेकर नोएडा-गाजियाबाद तक, जहां गुर्जर आबादी 5 से 15 प्रतिशत है, वहां सपा अब भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगाने को तैयार है। 2014 से यह भाजपा का कोर वोट रहा है। लेकिन, सपा मुस्लिम-गुर्जर गठजोड़ से इसे तोड़ना चाहती है। यही वजह है कि सपा अपनी रैली में पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक के साथ गुर्जर वोटबैंक पर भी फोकस कर रही है।
आपको बता दें समाजवादी पार्टी ने 2022 का विधानसभा चुनाव जयंत चौधरी की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल के साथ मिलकर लड़ा था। लेकिन, लोकसभा चुनाव से पहले जयंत ने भाजपा से गठबंधन कर लिया था। जिसके कारण लोकसभा चुनाव में इसका ज्यादा असर नहीं पड़ा। वहीं अब चुनाव विधानसभा का है। ऐसे में सपा कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहती। वो अपने सबसे कमजोर इलाके से शुरुआत कर रही है। ऐसे में अगर आने वाले समय में सपा के गुर्जर नेता भीड़ जुटाने में कामयाब रहते हैं, तो ये भाजपा के साथ रालोद के माथे पर भी चिंता की लकीरें बढ़ा देगी। सपा अगर 20-25% गुर्जर वोट भी पाती है, तो कई सीटों के समीकरण बदल जाएंगे।
वहीं दादरी रैली में तल्खी तब बढ़ गई जब अखिलेश ने प्रधानमंत्री मोदी के 'ATM' वाले बयान पर तीखा हमला बोला।
अखिलेश ने कहा कि जो लोग एयरपोर्ट का उद्घाटन कर रहे हैं, वो पहले ये बताएं कि पिछले 7 में से 6 एयरपोर्ट बंद क्यों हो गए? कहीं ये जेवर एयरपोर्ट भी बेचने के लिए तो नहीं बनाया जा रहा?
वहीं अखिलेश ने किसानों के मुआवजे, बेरोजगारी और पेपर लीक जैसे मुद्दों को उठाकर युवाओं और अन्नदाताओं को सीधे अपने पाले में खींचने की कोशिश की। उन्होंने वादा किया कि सपा की सरकार बनते ही किसानों को बाजार रेट पर मुआवजा दिया जाएगा। अखिलेश यादव ने दादरी के मंच से एक नया वैचारिक युद्ध छेड़ दिया है। उन्होंने कहा कि यह लड़ाई किसी एक चुनाव की नहीं, बल्कि उस शोषण के खिलाफ है जहां 5% लोग 95% आबादी का हक मार रहे हैं।
अखिलेश ने चेतावनी दी कि जो लोग '400 पार' का नारा देकर संविधान बदलना चाहते थे, वे अभी अंडरग्राउंड हुए हैं, खत्म नहीं। जब तक भाजपा है, संविधान खतरे में है।
कुल मिलाकर देखा जाए तो दादरी की इस रैली ने यह तो साफ कर दिया है कि 2027 की लड़ाई 'हिंदुत्व बनाम ध्रुवीकरण' के बजाय 'PDA बनाम विकास-मुआवजा' की तरफ मुड़ सकती है। 2022 में सपा-रालोद गठबंधन ने 140 में से 36 सीटें जीती थीं, लेकिन अब रालोद के भाजपा के साथ जाने के बाद अखिलेश खुद फ्रंट फुट पर खेल रहे हैं। 8 महीने की कड़ी मेहनत, 100 मीटर लंबा पांडाल और 32 जिलों से जुटी भीड़ ने भाजपा के माथे पर चिंता की लकीरें जरूर खींच दी होंगी। राजकुमार भाटी का चुनाव न लड़कर 140 सीटों पर प्रचार करने का संकल्प और अखिलेश का आक्रामक अंदाज बताता है कि 'मिशन यूपी 2027' का शंखनाद हो चुका है। अब देखना यह है कि क्या गुर्जर समाज का कमल से मोहभंग होगा और क्या साइकिल पश्चिमी यूपी के ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर सरपट दौड़ पाएगी?
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