राम मंदिर मुद्दे पर अखिलेश का बड़ा हमला! शंकराचार्य संग मुलाकात से हलचल

उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों में इस वक्त एक ऐसी मुलाकात ने भूचाल ला दिया है, जिसने सत्ताधारी दल बीजेपी के खेमे में खलबली मचा दी है! अमूमन राम मंदिर, आस्था और गौरक्षा जैसे मुद्दों पर बैटिंग करने वाली बीजेपी को अब उसी की पिच पर घेरने की एक बहुत बड़ी बिसात बिछ चुकी है। जी हां समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव आज गुरुवार की सुबह ठीक 8 बजे अचानक राजधानी लखनऊ के फैजुल्लागंज इलाके में स्थित जगन लाल यादव गेस्ट हाउस पहुंचे। वहां उन्होंने किसी नेता से नहीं, बल्कि देश के बड़े धर्मगुरु और ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के चरणों में बैठकर उनका आशीर्वाद लिया। करीब 30 मिनट तक चली इस बंद कमरे की मुलाकात का जो वीडियो और तस्वीरें सामने आई हैं, उसने यूपी की राजनीति का पारा सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है। राम मंदिर में चढ़ावा-चंदा चोरी का मुद्दा और गाय को राष्ट्रमाता का दर्जा दिलाने की मांग, इन दो मुद्दों पर दोनों के बीच ऐसी बातचीत हुई है कि अब यह चर्चा शुरू हो गई है कि क्या साल 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश यादव ने अपनी हिंदू विरोधी छवि को पूरी तरह मटियामेट करने और बीजेपी के कोर एजेंडे को हथियाने का मास्टरस्ट्रोक खेल दिया है? आइए जानते हैं। 

आपको बता दें शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से आशीर्वाद लेने के बाद जब अखिलेश यादव बाहर निकले, तो उनके तेवर एकदम बदले हुए थे। मीडिया के कैमरों के सामने आते ही सपा मुखिया ने बीजेपी सरकार पर तीखे शब्दों के ऐसे बाण चलाए कि पूरी सरकार बैकफुट पर नजर आने लगी। अखिलेश यादव ने सीधे तौर पर कहा कि अयोध्या के राम मंदिर में जो चंदा और चढ़ावा चोरी की घटना सामने आई है, उससे साफ साबित हो गया है कि धर्म के नाम पर बहुत बड़ा महापाप हुआ है। उन्होंने गरजते हुए कहा कि यह महापाप किसी और ने नहीं, बल्कि खुद बीजेपी के लोगों ने किया है। इस खुलासे के बाद से बीजेपी के अंदर भयंकर भगदड़ मची हुई है और उनकी ही पार्टी के बहुत सारे नेता अब समाजवादी पार्टी के संपर्क में आ चुके हैं। अखिलेश ने कहा जो भारतीय जनता पार्टी के विचार हैं वह वोट के लिए बदलते हैं, उनके लिए धर्म नहीं धन प्राथमिकता है। 

अखिलेश यादव यहीं नहीं रुके, उन्होंने सरकार द्वारा बनाई गई जांच टीम SIT को भी आड़े हाथों लिया। उन्होंने सनसनीखेज आरोप लगाते हुए कहा कि जांच के नाम पर SIT सिर्फ और सिर्फ इस पूरे घोटाले पर लीपापोती करने का खेल खेल रही है। अखिलेश ने कहा कि उस टीम में एक ऐसा सदस्य भी शामिल है, जिस पर खुद धारा 420 का मुकदमा दर्ज है! ऐसे में भला निष्पक्ष जांच की उम्मीद कैसे की जा सकती है? 

आपको बता दें इस पूरी मुलाकात का सबसे खास हिस्सा वो था, जब वीडियो में खुद शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद राम मंदिर दान चोरी मामले पर सरकार को आड़े हाथों लेते दिखे। जब अखिलेश यादव उनके चरणों के पास बैठे थे, तब शंकराचार्य ने साफ लफ्जों में कहा कि राम मंदिर में बहुत बड़ा घोटाला हुआ है। जब उनसे पूछा गया कि सरकार तो कह रही है कि कार्रवाई होगी, इस पर शंकराचार्य ने बेहद तीखा और बड़ा राजनीतिक बयान दे डाला। उन्होंने कहा कि हां, इस पूरे मामले में कार्रवाई तो निश्चित रूप से होगी, लेकिन वो कार्रवाई तब होगी जब उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री बदल जाएंगे! जब नया मुख्यमंत्री आएगा, तब जाकर इस पूरे मामले की सही तरीके से और कड़ी जांच होगी और दोषियों को जेल भेजा जाएगा। शंकराचार्य का यह बयान सीधा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर निशाना माना जा रहा है, जिसने विपक्षी खेमे को बैठे-बिठाए एक बहुत बड़ा हथियार दे दिया है। वहीं गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने को लेकर शंकराचार्य ने कहा कि यदि कोई सरकार सच में गाय को माता मानती है तो सत्ता में आने के बाद उसे राष्ट्रीय पशु घोषित करने में देर नहीं लगनी चाहिए। 

आपको बता दें यहां सबसे दिलचस्प बात यह है कि पिछले 10 से 12 सालों में यह पहली बार देखा जा रहा है जब समाजवादी पार्टी सॉफ्ट हिंदुत्व या कहें कि पूरी तरह से बीजेपी की पिच पर आकर आक्रामक बल्लेबाजी कर रही है। अब तक गौरक्षा और सनातन धर्म की बातें सिर्फ बीजेपी के मंचों से सुनाई देती थीं, लेकिन इस बार पासा पलट चुका है। अखिलेश यादव खुद यादव समाज से आते हैं, जो खुद को भगवान श्रीकृष्ण का वंशज मानते हैं। ऐसे में गाय और गौवंश के साथ उनका स्वाभाविक और भावनात्मक जुड़ाव दिखाना एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिससे बीजेपी का वो वोटर जो गाय और सनातन के नाम पर वोट देता है, उसे अपनी तरफ खींचा जा सके। अखिलेश ने कहा कि बीजेपी के लोग सिर्फ वोट बैंक के लिए अपने विचारों और सिद्धांतों को बदलते रहते हैं, लेकिन आज के समय में हर चीज रिकॉर्ड पर है और जनता सब समझ रही है। वहीं दूसरी तरफ कहा जा रहा है कि अखिलेश यादव और शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद की इस मुलाकात के बहुत गहरे सियासी मायने हैं। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद देश के उन गिने-चुने और बेहद कद्दावर धर्मगुरुओं में से एक हैं, जिन्होंने अयोध्या में राम मंदिर के अधूरे निर्माण के बीच उद्घाटन करने और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्राण प्रतिष्ठा की पूजा किए जाने पर खुलकर शास्त्रीय सवाल उठाए थे। 

विपक्ष हमेशा से उनके बयानों को ढाल बनाकर बीजेपी को शंकराचार्यों का अनादर करने वाली पार्टी बताता रहा है। इसके अलावा, प्रयागराज में जब प्रशासन की तरफ से शंकराचार्य के साथ कथित तौर पर बदसलूकी की बात सामने आई थी या उनके खिलाफ कुछ मुकदमे दर्ज हुए थे, तब भी अखिलेश यादव और पूरी समाजवादी पार्टी खुलकर उनके बचाव में उतरी थी। यही वजह है कि बीजेपी हमेशा यह आरोप लगाती रही है कि शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद कहीं न कहीं राजनीतिक रूप से विपक्ष के एजेंडे को हवा दे रहे हैं। हालांकि यह कोई पहली मुलाकात नहीं थी। पिछले चार महीनों के भीतर अखिलेश यादव की शंकराचार्य से यह दूसरी बड़ी मुलाकात है। इससे पहले इसी साल 12 मार्च को भी लखनऊ में दोनों की भेंट हुई थी। इतना ही नहीं, करीब एक महीने पहले समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता शिवपाल सिंह यादव और मैनपुरी से सांसद डिंपल यादव ने भी शंकराचार्य से मुलाकात कर उनका आशीर्वाद लिया था। यानी सपा का पूरा कुनबा लगातार शंकराचार्य के संपर्क में है और उनके जरिए उत्तर प्रदेश के सनातनी और हिंदू वोटरों के बीच एक नया नैरेटिव सेट करने की कोशिश की जा रही है कि बीजेपी असली हिंदू विरोधी है जो साधु-संतों को परेशान करती है और मंदिर के चंदे में भी चोरी करवाती है।

तो कुल मिलाकर कहानी यह है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति इस वक्त एक बेहद दिलचस्प मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है। जहां एक तरफ बीजेपी खुद को हिंदुओं और सनातन की इकलौती रक्षक बताती आई है, वहीं अब अखिलेश यादव ने शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का हाथ थामकर सीधे बीजेपी के अभेद्य किले में सेंध लगा दी है। राम मंदिर के चंदे में कथित घोटाले को उठाकर और गाय को राष्ट्रमाता बनाने की मांग का समर्थन करके सपा ने सनातनी वोटरों के दिल में यह बात डालनी शुरू कर दी है कि धर्म के नाम पर मौजूदा सरकार में अधर्म हो रहा है। ऊपर से शंकराचार्य का यह तीखा बयान कि 'कार्रवाई तो नया मुख्यमंत्री ही करेगा', योगी सरकार के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है। अब देखना यह होगा कि बीजेपी इस सियासी हमले का क्या जवाब देती है और क्या अखिलेश यादव का यह 'शंकराचार्य कार्ड' साल 2027 में उन्हें लखनऊ के सिंहासन तक पहुंचा पाएगा? हालात बहुत तेजी से बदल रहे हैं और यूपी की चुनावी बिसात पर शह और मात का खेल अब और भी ज्यादा खूंखार हो चुका है! 

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