अखिलेश का सनातन शरणम गच्छामि- आस्था या सियासत
अखिलेश का सनातन शरणम गच्छामि- आस्था या सियासत
समाजवादी पार्टी के मुखिया और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अब 2027 चुनाव में अलग तरीके की रणनीति पर काम करते चले आ रहे हैं एक तरफ तो वो PDA फॉर्मूले पर पूरे भरोसे के साथ टिके हुए हैं और दूसरी तरफ अखिलेश यादव सनातन की राह पर आगे बढ़ते हुए भाजपा की हिदुत्व नीति की काट तैयार कर रहे हैं। सपा प्रमुख अखिलेश का PDA फार्मूला तो 2024 के आम चुनाव में काम कर गया और सपा को लोकसभा सीटों के हिसाब से देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई और अब बारी है सपा के सनातन कार्ड की जिसकी शुरुआत भी इटावा में प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ भगवान केदारनाथ की तर्ज पर इटावा में भगवान केदारेश्वर मंदिर की स्थापना की। जो लगभग 11 एकड़ में बनाया जा रहा है और सपा प्रमुख ने 2026 की रामनवमी पर भगवान रामलला की मूर्ति की स्थापित की है। यानि भगवान केदारेश्वर के साथ साथ भगवान राम की पूजा भी हो सकेगी।
केदारेश्वर मंदिर से क्या है 2027 का संदेश
अभी फ़िलहाल एक नया ऐलान चर्चा में आ गया है जिससे उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर बड़ा सियासी मोड़ देखने को मिल रहा है। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव का हालिया रुख अब नई बहस को जन्म दे रहा है। सपा प्रमुख आगामी सावन के महीने में 11 अगस्त को इटावा के केदारेश्वर मंदिर में कुम्भ अभिषेकम करने जा रहे हैं। पर यह सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि इसके पीछे छिपे राजनीतिक संकेतों को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। जो सीधे तौर पर सनातन धर्म की ओर झुकाव को दर्शाता है।जो यूपी विधानसभा चुनाव के समय आस्था कम सियासत ज्यादा नज़र आ रहा है। कुल मिलाकर सपा प्रमुख अखिलेश यादव सनातन कार्ड के जरिये भाजपा की हिंदुत्व नीति की हवा निकालना चाहते हैं क्योंकि सपा प्रमुख भी समय चुके हैं कि 2027 का गढ़ बिना सनातन नीति के संभव नहीं क्योंकि उनका परंपरागत M-Y फैक्टर उनको सत्ता की कुर्सी तक पहुंचाने मे नाकाफ़ी हो रहा है।
आस्था या राजनीति? उठ रहे हैं सवाल
अखिलेश यादव के इस कदम को लेकर दो तरह की राय सामने आ रही है—एक पक्ष का मानना है कि यह उनकी व्यक्तिगत आस्था का विषय है और हर नेता को अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चलने का अधिकार है।वहीं दूसरा पक्ष इसे पूरी तरह से राजनीतिक रणनीति के तौर पर देख रहा है। उनका कहना है कि यह “सॉफ्ट हिंदुत्व” की ओर बढ़ने की कोशिश है, जिससे हिंदू वोट बैंक को साधा जा सके।
सपा की बदली रणनीति?
समाजवादी पार्टी की छवि लंबे समय तक एक विशेष वर्ग की पार्टी के रूप में देखी जाती रही है। लेकिन पिछले कुछ समय में पार्टी अपने इस इमेज को बदलने की कोशिश कर रही है। अखिलेश यादव का मंदिरों में जाना, धार्मिक आयोजनों में भाग लेना और नवरात्र में कन्या भोज कराना और अब भगवान केदारेश्वर मंदिर का निर्माण और कुम्भ अभिषेकम का ऐलान इन सभी को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सपा अब समावेशी राजनीति के जरिए सभी वर्गों को साधने की कोशिश में है।
हिंदू वोट बैंक पर नजर?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में हिंदू वोट बैंक की भूमिका बेहद अहम रही है। पिछले कुछ चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने इस वोट बैंक पर मजबूत पकड़ बनाई है।ऐसे में अखिलेश यादव का यह कदम सीधे तौर पर इस समीकरण को चुनौती देने के रूप में भी देखा जा रहा है। क्या सपा अब उसी पिच पर खेलना चाहती है, जहां भाजपा पहले से मजबूत है? यही सवाल अब चर्चा का केंद्र बन गया है।
2027 चुनाव का मास्टरस्ट्रोक?
राजनीति में हर कदम का समय बेहद मायने रखता है। 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले इस तरह का धार्मिक संदेश देना कई संकेत देता है।
यह माना जा रहा है कि अखिलेश यादव अभी से चुनावी जमीन तैयार करने में जुट गए हैं और यह कदम उसी दिशा में एक बड़ा संकेत हो सकता है।
विपक्ष और समर्थकों की प्रतिक्रिया जहां सपा समर्थक इसे सकारात्मक बदलाव बता रहे हैं, वहीं विपक्ष इसे “चुनावी स्टंट” करार दे रहा है। राजनीतिक गलियारों में इस मुद्दे पर तीखी बहस छिड़ गई है—क्या यह सपा प्रमुख की सच्ची आस्था है या सिर्फ वोट पाने की रणनीति?
निष्कर्ष: बदलती राजनीति की नई तस्वीर
अखिलेश यादव का “सनातन शरणम गच्छामि” वाला कदम यह दिखाता है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति अब नए दौर में प्रवेश कर चुकी है जहां धर्म और राजनीति का मेल पहले से ज्यादा स्पष्ट नजर आ रहा है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि यह रणनीति सपा के लिए कितना फायदेमंद साबित होती है और क्या यह 2027 के चुनावों में कोई बड़ा बदलाव ला पाएगी क्या 2027 के चुनाव में PDA फार्मूला और सनातन कार्ड सपा को सत्ता की कुर्सी पर पहुंचा सकेगा?


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