मतभेद भुलाकर मिले मोदी-खड़गे; संसद परिसर में दिखा 'मनभेद' मुक्त भारत

आज लोकतंत्र की उस सबसे खूबसूरत तस्वीर ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया, जिसकी कल्पना अक्सर टीवी डिबेट्स के शोर में खो जाती है। जी हां मौका था भारतीय संविधान के शिल्पकार, भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर की 135वीं जयंती का, और मंच था संसद परिसर का प्रेरणा स्थल। जहाँ आमतौर पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक और वैचारिक तलवारें खिंची रहती हैं, आज वहाँ सियासी सौहार्द की ऐसी खुशबू बिखरी कि देखने वाले दंग रह गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे जो राजनीति के दो अलग ध्रुवों का प्रतिनिधित्व करते हैं, वो न केवल एक-दूसरे से गर्मजोशी के साथ मिले, बल्कि उनके बीच हुई ठहाकों भरी बातचीत ने यह संदेश दे दिया कि लोकतंत्र में मतभेद हो सकते हैं, पर मनभेद की कोई जगह नहीं है। यह सिर्फ एक श्रद्धांजलि सभा नहीं थी, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का एक ऐसा जीवंत उत्सव था, जिसने सोशल मीडिया से लेकर संसद तक तहलका मचा दिया है।

दरअसल, संसद परिसर के प्रेरणा स्थल पर सुबह से ही हलचल तेज थी। उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जैसे ही बाबासाहेब की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की, माहौल भक्ति और राष्ट्रवाद से सराबोर हो गया। लेकिन असली सुर्खियां तब बनीं जब पीएम मोदी और मल्लिकार्जुन खड़गे का आमना-सामना हुआ। दोनों नेताओं ने मुस्कुराते हुए हाथ मिलाया और कुछ पलों तक ऐसी गुफ्तगू की जिसने वहां मौजूद हर शख्स के चेहरे पर मुस्कान ला दी। वीडियो में साफ दिखा कि खड़गे जी ने मजाकिया अंदाज में कुछ कहा, जिस पर पीएम मोदी अपनी हंसी नहीं रोक पाए और खिलखिलाकर हंस पड़े। यह पल भारतीय राजनीति के इतिहास में एक मास्टरस्ट्रोक की तरह दर्ज हो गया, जिसने यह साबित किया कि महापुरुषों के सम्मान के आगे हर राजनीतिक दीवार छोटी है। वहीं सौहार्द का यह सिलसिला आज ही नहीं, बल्कि शनिवार 11 अप्रैल को भी देखने को मिला था। महात्मा ज्योतिबा फुले की जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी और लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी के बीच लंबी बातचीत हुई थी। उस दौरान पीएम मोदी लगातार राहुल गांधी से कुछ कह रहे थे और राहुल गांधी बहुत ही एकाग्रता के साथ उनकी बात सुनते हुए सिर हिला रहे थे। हालांकि, जयंती के मौके पर राहुल गांधी ने अपने विचारों में तीखापन भी रखा। उन्होंने बाबासाहेब को नमन करते हुए आगाह किया कि आज कुछ ताकतें संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने की कोशिश कर रही हैं और उन्होंने आखिरी दम तक संविधान की रक्षा का संकल्प दोहराया।

वहीं आज गुजरात दौरे पर रहीं राष्ट्रपति द्रौपदी मूर्मू ने गांधीनगर में बाबासाहेब को श्रद्धांजलि दी और उन्हें समतामूलक समाज का सशक्त प्रवक्ता बताया। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा और अधिकारों के प्रति अंबेडकर के योगदान को भावी पीढ़ियों के लिए मशाल बताया। तो वहीं दूसरी तरफ गृह मंत्री अमित शाह ने जोर देकर कहा कि बाबासाहेब ने अनुच्छेद 370 का विरोध कर अखंड भारत की नींव रखी थी। उन्होंने शिक्षित बनो और संगठित रहो के मंत्र को याद किया। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उन्हें महान समाज सुधारक बताते हुए कहा कि विपरीत परिस्थितियों में भी बाबासाहेब ने जो हासिल किया, वह दुनिया के लिए एक मिसाल है। इसके अलावा लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, किरेन रिजिजू, अर्जुन राम मेघवाल और रामदास अठावले जैसे नेताओं ने भी प्रेरणा स्थल पहुंचकर बाबा साहेब को श्रद्धासुमन अर्पित किए।

आपको बता दें इस ऐतिहासिक दिन को और भी यादगार बनाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्र को एक बड़ा विकास उपहार भी दिया। उन्होंने 210 किलोमीटर लंबे दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे का उद्घाटन संपन्न किया। यह 6-लेन वाला इंजीनियरिंग का चमत्कार अब दिल्ली से देहरादून की यात्रा को 6 घंटे से घटाकर महज ढाई घंटे कर चुका है। यह बाबासाहेब के उस सपने को साकार करने की दिशा में एक कदम है जहाँ कनेक्टिविटी और प्रगति हर नागरिक के द्वार तक पहुँचे। बीजेपी ने इस मौके को केवल एक दिन तक सीमित नहीं रखा। कर्नाटक में पार्टी ने 13 से 20 अप्रैल तक पूरे राज्य में जिला और तालुका स्तर पर कार्यक्रमों की श्रृंखला शुरू कर दी है। पूर्व उपमुख्यमंत्री गोविंद कारजोल ने साफ किया कि अंबेडकर केवल एक वर्ग के नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के गौरव हैं और उनका जीवन समानता का सबसे बड़ा प्रतीक है।

जाहिर है आज संसद परिसर के प्रेरणा स्थल से जो संदेश निकला है, वह किसी भी चुनावी जीत-हार से कहीं ज्यादा बड़ा है। जब पीएम मोदी ने 'वसुधैव कुटुम्बकम' के मंत्र के साथ सुभाषितम् साझा किया, तो उन्होंने साफ कर दिया कि 'यह मेरा है और वह पराया है' जैसी सोच छोटे मन वालों की होती है, जबकि उदार हृदय वालों के लिए पूरा संसार ही परिवार है। खड़गे और मोदी के ठहाकों ने देश की जनता को यह भरोसा दिलाया है कि भले ही नीतियों पर तकरार हो, लेकिन राष्ट्र के नायकों और संवैधानिक मर्यादाओं पर पूरा देश एक है। ऐसे में हजारों आम लोगों की मौजूदगी में बाबासाहेब की जयंती का यह उत्सव न केवल उनके योगदान को याद करने का दिन बना, बल्कि इसने भारतीय लोकतंत्र की उस ताकत को भी दुनिया के सामने रखा, जहाँ सम्मान का पुल नफरत की हर खाई को पाट देता है। 

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