परिसीमन और महिला आरक्षण के बाद अमित शाह के अनुसार बढ़ेंगी लोकसभा सीटें
भारत की राजनीति में इस समय दो बड़े विषय—महिला आरक्षण और परिसीमन—लगातार चर्चा के केंद्र में हैं। इन दोनों को मिलाकर ऐसे बदलाव के रूप में देखा जा रहा है, जो आने वाले समय में देश के राजनीतिक संतुलन को काफी हद तक बदल सकते हैं। सरकार का कहना है कि यह कदम महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल है, जबकि विपक्ष इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाने वाला फैसला मान रहा है।
सरकार संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लागू करना चाहती है, जिसके लिए “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” लाया गया है। लेकिन इसे अमल में लाने के लिए संसदीय सीटों के पुनर्गठन की जरूरत होगी। इसी कारण लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर लगभग 816 से 850 के बीच करने का प्रस्ताव सामने आया है, और यह काम परिसीमन प्रक्रिया के जरिए होगा।
परिसीमन क्यों बना विवाद का कारण?
संविधान के अनुसार परिसीमन का मतलब है जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण। सरकार 2011 की जनगणना के आधार पर यह प्रक्रिया आगे बढ़ाना चाहती है। यहीं से असहमति शुरू होती है, क्योंकि दक्षिण भारत में जनसंख्या वृद्धि अपेक्षाकृत कम रही है, जबकि उत्तर भारत में जनसंख्या तेजी से बढ़ी है। ऐसे में दक्षिणी राज्यों को आशंका है कि नई सीटों का बड़ा लाभ उत्तर भारत को मिलेगा।
हालांकि प्रधानमंत्री ने यह स्पष्ट किया है कि किसी भी राज्य के साथ भेदभाव नहीं होगा और सभी क्षेत्रों—उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम—को समान रूप से प्रतिनिधित्व मिलेगा। उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी राज्य की मौजूदा हिस्सेदारी कम नहीं की जाएगी। साथ ही उन्होंने यह टिप्पणी भी की कि जो लोग महिला आरक्षण का विरोध करेंगे, उन्हें राजनीतिक रूप से इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
अमित शाह द्वारा दिए गए आंकड़े
गृह मंत्री अमित शाह ने दावा किया कि दक्षिण भारत को नुकसान नहीं बल्कि लाभ मिलेगा। उनके अनुसार पांच दक्षिणी राज्यों की कुल लोकसभा सीटें 129 से बढ़कर लगभग 195 तक पहुंच सकती हैं, यानी करीब 50% की वृद्धि। हालांकि कुल मिलाकर उनका राष्ट्रीय अनुपात लगभग स्थिर रहेगा (23.76% से बढ़कर 23.87%)।
उन्होंने राज्यवार अनुमान भी साझा किए:
- तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर लगभग 59 हो सकती हैं (करीब 20 सीटों की बढ़ोतरी)
- कर्नाटक में 28 से 42 सीटें
- आंध्र प्रदेश में 25 से 38 सीटें
- केरल में 20 से 30 सीटें
- तेलंगाना में 17 से 26 सीटें
इसके अलावा महाराष्ट्र को भी लगभग 24 अतिरिक्त सीटें मिलने की संभावना बताई गई है। सरकार का दावा है कि सभी राज्यों की सीटें उनके मौजूदा अनुपात के आधार पर ही बढ़ाई जाएंगी, यानी प्रो-राटा (pro-rata) प्रणाली के तहत।
विपक्ष की आपत्तियाँ
विपक्ष इस पूरे प्रस्ताव पर कई गंभीर सवाल उठा रहा है। कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने आरोप लगाया कि सरकार संस्थाओं पर पहले से दबाव बना रही है और अब यह कदम लोकतंत्र के लिए सीधा खतरा है। उनका सवाल है कि महिलाओं को 33% आरक्षण मौजूदा 543 सीटों के भीतर ही क्यों नहीं दिया जा सकता।
वहीं अखिलेश यादव ने इसे “नारे में बदल दी गई महिला सशक्तिकरण की नीति” बताया और यह भी मांग उठाई कि ओबीसी और मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण का प्रावधान होना चाहिए।
दक्षिण भारत की चिंता
हालांकि सरकार ने यह भरोसा दिलाया है कि किसी राज्य के साथ अन्याय नहीं होगा, फिर भी दक्षिणी राज्यों में आशंका बनी हुई है। तमिलनाडु और अन्य राज्यों को लगता है कि सीटें बढ़ने के बावजूद राष्ट्रीय राजनीति में उनका सापेक्ष प्रभाव कम हो सकता है, जबकि अधिक जनसंख्या वाले राज्यों का दबदबा बढ़ जाएगा। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन पहले ही इसे “ऐतिहासिक अन्याय” करार दे चुके हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि “प्रो-राटा फॉर्मूला” अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है और 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन करना भी विवादों से घिर सकता है। ऐसे में महिला आरक्षण को लागू करने की प्रक्रिया भी तकनीकी और राजनीतिक रूप से जटिल बनी हुई है।
कुल मिलाकर, सरकार इसे महिला सशक्तिकरण की बड़ी उपलब्धि के रूप में देख रही है, जबकि विपक्ष इसे लोकतांत्रिक संतुलन के लिए चुनौती मान रहा है। अंतिम फैसला संसद में ही तय होना है, जहां इस पर व्यापक राजनीतिक बहस और टकराव की संभावना बनी हुई है।


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