इंसान के अंदर से ख़त्म हो चुकी इंसानियत को जागृत करती हुई बेहतरीन रचना

हम भले ही किसी धर्म में जन्म लेते हो भले ही किसी धर्म का पालन करते हो .लेकिन हम सभी को इश्वर ने एक धर्म में सामान रखा है और वो है इंसानियत .जिसका पालन करने से ना सिर्फ भगवान खुश होते बल्कि आत्मा को अथाह ख़ुशी की अनुभूति होती है ,लेकिन यह बहुत बड़ा दुर्भाग्य ही है कि इंसान खुद के द्वारा बनाये गये जाति,धर्म के खातिर इन्सनियता ,मानवता का सबसे बड़ा शत्रु बन बैठा है. मानव चेतना को जागृत करने के प्रयास में लिखी गई एक छोटी सी रचना जो इंसान के अन्दर से ख़त्म हो रही इंसानियत और मानवता को पुनः जागृत करने की कोशिश कर रही है ....
वाह रे मानव, मानवता का दुश्मन है तू आज बना।
क्यों तू इंसान से है हैवान बना?
वाह! पत्थर पूजते पूजते तूभी पत्थर बन गया।
धर्म जाति के नाम पर इंसानियत का गला घोंटने को
है तू सीना तान खड़ा।
धर्म-जाति के चक्रव्यूह में ऐसा फसा,
कि तू इंसान को इंसान समझना ही भूल गया।
किसी को हिंदू तो किसी को मुस्लिम तूने नाम दिया,
किताबों वाले हाथों में पत्थर तूने थमा दिया।
स्याही से रंगने वाले हाथों को रक्तरंजित तूने करा दिया,
प्रेम व सौहार्द की खुशबुओं से महकने वाले बागों में
नफ़रत का बीज तूने लगा दिया।
भूल गया तू ,
कि सबसे पहले तू इंसान है
फिर हिन्दू -मुस्लिम, सिक्ख आदि है ।
मानवता को मृत्यु शैय्या पर सुला कर
तूने खुद पर बड़ा नाज किया,
पर भूल गया कि जिस रास्ते पर है तू चला,
उससे तूने खुद का ही विनाश किया ।
इंसान का मानवता ही है सबसे बड़ा धर्म ,
ये भी तुझे न याद रहा।
है कैसा तू किसी धर्म का अनुयायी?
जो इंसानियत का फर्ज भी तुझे न याद रहा।
है किस काम का वो धर्मग्रंथ?
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