अंजना बक्शी की कविताएँ- स्त्री मन और जीवन की अभिव्यक्ति...!

दमोह, मध्य प्रदेश की सरज़मीं पर जन्मीं युवा प्रतिभा सम्मान से सम्मानित कवयित्री अंजना बक्शी बड़ी ही मुखरता से और सधे हुए अंदाज़ में और सरल शब्दों, किन्तु रोचक शैली में अपनी कविताओं का लेखन किया है। वो एक कविता में अपनी कविता लेखन की कला पर स्वयं लिखती हैं कि...

कविता मुझे लिखती है
या, मैं कविता को
समझ नहीं पाती
जब भी उमड़ती है
भीतर की सुगबुगाहट
कविता गढ़ती है शब्द
और शब्द गन्धाते हैं कविता
जैसे चौपाल से संसद तक
गढ़ी जाती हैं ज़ुल्म की
अनगिनत कहानियाँ,
वैसे ही,
मुट्ठी भर शब्दों से
गढ़ दी जाती है।

ऐसे ही कई कविताओं में अंजना बक्शी ने स्त्री जीवन, स्त्री मन की व्यथा के साथ-साथ जीवन के उतार चढ़ाव को भी अपनी कविताओं में ढाला है। एक कविता में अंजना बक्शी ने अपनी लेखनी से अपने अंतर्मन में अलग-अलग संदर्भों और अवसरों पर आने वाले विचारों के सैलाब पर भी कविता लिखी। तो आइये आज आपको रूबरू करवाते हैं अंजना बक्शी की लेखनी से निकली दो प्रमुख कविताओं से जिन्होंने स्त्री-मन और जीवन को बखूबी बयाँ किया है।

 

मेरे भीतर
कई कमरे हैं
हर कमरे में
अलग-अलग सामान
कहीं कुछ टूटा-फूटा
तो कहीं
सब कुछ नया!
एकदम मुक्तिबोध की
कविता-जैसा

बस ख़ाली है तो
इन कमरों की
दीवारों पर
ये मटमैला रंग
और ख़ाली है
भीतर की
आवाज़ों से टकराती
मेरी आवाज़

नहीं जानती वो
प्रतिकार करना
पर चुप रहना भी
नहीं चाहती
कोई लगातार
दौड़ रहा है
भीतर
और भीतर

इन छिपी
तहों के बीच
लुप्त हो चली है
मेरी हँसी
जैसे लुप्त हो गई
नाना-नानी
और दादा-दादी
की कहानियाँ
परियों के किस्से
वो सूत कातती
बुढ़िया
जो दिख जाया करती
कभी-कभी
चंदा मामा में

मैं अभी भी
ज़िंदा हूँ
क्योंकि मैं
मरना नहीं चाहती
मुर्दों के शहर में
सड़ी-गली
परंपराओं के बीच
जहाँ हर
चीज़ बिकती हो
जैसे बिकते हैं
गीत
बिकती हैं
दलीलें
और बिका करती हैं
गुलाबी रंगों वाली
वो देह
जिसमें बंद हैं
कई कमरे

और हर
कमरे की
चाबी
टूटती बिखरती
जर्जर मनुष्यता-सी
कहीं खो गई!

2

पौ फटते ही
उठ जाती हैं स्त्रियाँ
बुहारती हैं झाड़ू
और फिर पानी के
बर्तनों की खनकती
हैं आवाज़ें

पायल की झंकार और
चूड़ियों की खनक से
गूँज जाता है गली-मुहल्ले
का नुक्कड़
जहाँ करती हैं स्त्रियाँ
इंतज़ार कतारबद्ध हो
पाने के आने का।

होती हैं चिंता पति के
ऑफिस जाने की और
बच्चों के लंच बाक्स
तैयार करने की,

देखते ही देखते
हो जाती है दोपहर
अब स्त्री को इंतज़ार
होता है बच्चों के
स्कूल से लौटने का

और फिर धीरे-धीरे
ढल जाती है शाम भी
उसके माथे की बिंदी
अब चमकने लगती है
पति के इंतज़ार में

और फिर होता
उसे पौ फटने का
अगला इंतज़ार!!

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