इतनी ठोकरें खाकर भी मुझको दुनियादारी निभाना नहीं आता…।

छत्तीसगढ़ के जांजगीर में जन्मे अनवर सुहैल एक ऐसे कवि हैं जिन्होंने कटाक्षपूर्ण शैली में अपनी कविताओं व अन्य रचनाओं में समाज के विभिन्न मुद्दों को उठाया है जिनमें कहीं व्यंग्य है तो कहीं रोष और तो कहीं अफ़सोस। कभी अनवर सुहैल ने संगठित अपराध पर निशाना साधा है, तो कभी समाज के छलावे पर हमला बोला है। वहीं इसके अलावा स्वाभिमान और दुनियादारी के बीच के द्वंद्व को भी अनवर सुहैल ने बखूबी बयाँ किया है। तो आइये आज अनवर सुहैल की उन तीन प्रमुख कविताओं का रसास्वादन करते हैं, जो उपर्युक्त तीनों भावों को अलग-अलग बयाँ करती हैं...।
उसने अपनी बात कही तो
भड़क उठे शोले
गरज उठी बन्दूकें
चमचमाने लगीं तलवारें
निकलने लगी गालियाँ…
चारों तरफ़ उठने लगा शोर
पहचानो…पहचानो
कौन हैं ये
क्या उसे नही मालूम
हमारी दया पर टिका है उसका वजूद
बता दो सम्भल जाए वरना
च्यूँटी की तरह मसल दिया जाएगा उसे…
वो सहम गया
वो सम्भल गया
वो बदल गया
जान गया कि
उसका पाला संगठित अपराधियों से है…।
कर रहा हूँ इकट्ठा
वो सारे सबूत
वो सारे आँकडे…
जो सरासर झूठे हैं
और
जिन्हें बडी ख़ूबसूरती से
तुमने सच का जामा पहनाया है
कितना बडा़ छलावा है
मेरे भोले-भाले मासूम जन
ब-आसानी आ जाते हैं झाँसे में
ओ जादूगरो !
ओ हाथ की सफाई के माहिर लोगो !
तुम्हारा तिलस्म है ऐसा
कि सम्मोहित से लोग
कर लेते यक़ीन
अपने मौजूदा हालात के लिए
ख़ुद को मान लेते कुसूरवार
ख़ुद को भाग्यहीन…।
इतनी मुश्किलें हैं फिर भी
उसकी महफ़िल में जाकर मुझको
गिडगिडाना नहीं भाता…
वो जो चापलूसों से घिरे रहता है
वो जो नित नए रंग-रूप धरता है
वो जो सिर्फ हुक्म दिया करता है
वो जो यातनाएँ दे के हँसता है
मैंने चुन ली हैं सजा की राहें
क्योंकि मुझको हर इक चौखट पे
सर झुकाना नहीं आता…
उसके दरबार में रौनक रहती
उसके चारों तरफ सिपाही हैं
हर कोई उसकी इक नज़र का मुरीद
उसके नज़दीक पहुँचने के लिए
हर तरफ होड मची रहती है
और हम दूर दूर रहते हैं
लोगों को आगाह किया करते हैं
क्या करें,
इतनी ठोकरें खाकर भी मुझको
दुनियादारी निभाना नहीं आता…।
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