केजरीवाल का सत्याग्रह: दिल्ली हाई कोर्ट के सामने पेश होने से किया इनकार!
दिल्ली की सियासत में एक बार फिर भूचाल आ गया है! आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने न्यायपालिका के इतिहास में एक बड़ा कदम उठाते हुए दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की बेंच के सामने पेश होने से साफ इनकार कर दिया है। जी हां शराब घोटाले में निचली अदालत से बरी होने के बाद, हाई कोर्ट में जारी सुनवाई के बीच केजरीवाल का यह फैसला न केवल एक कानूनी चुनौती है, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक दांव भी माना जा रहा है।
उन्होंने सीधे तौर पर जज की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए महात्मा गांधी के सत्याग्रह की राह चुनने का ऐलान कर दिया है। केजरीवाल ने साफ कर दिया है कि वह न तो व्यक्तिगत रूप से और न ही अपने किसी वकील के माध्यम से इस कोर्ट की सुनवाई में हिस्सा लेंगे। दरअसल, केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा पर वैचारिक झुकाव होने का गंभीर आरोप लगाया है। केजरीवाल का दावा है कि जज महोबा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े संगठन 'अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद' के कार्यक्रमों में हिस्सा लेती रही हैं।
पूर्व सीएम ने दलील दी, जिस विचारधारा की सरकार ने मुझे झूठे केस में जेल भेजा, जज साहिबा उसी विचारधारा के मंचों पर जाती रही हैं। आपको बता दें केजरीवाल ने करीब डेढ़ घंटे तक खुद अपनी दलीलें पेश कर बेंच बदलने की अपील की थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया था। वहीं केजरीवाल ने एक वीडियो संदेश के जरिए जनता के सामने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि उन्हें एक गहरी साजिश के तहत फंसाया गया था। उन्होंने याद दिलाया कि निचली अदालत ने उन्हें पूरी तरह निर्दोष घोषित किया है और CBI की जांच पर सवाल उठाते हुए जांच अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई के आदेश दिए थे।
ऐसे में अरविंद केजरीवाल का यह कदम भारतीय कानूनी इतिहास के सबसे विवादित अध्यायों में से एक बनता जा रहा है। एक तरफ जहां जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा न्यायिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाने पर अड़ी हैं, वहीं केजरीवाल ने सत्याग्रह का रास्ता अपनाकर इस लड़ाई को कानूनी से ज्यादा नैतिक और राजनीतिक रंग दे दिया है। ऐसे में अब सवाल है कि क्या केजरीवाल को सर्वोच्च अदालत से राहत मिलेगी? या हाई कोर्ट जस्टिस शर्मा की कोर्ट में उनकी गैर-मौजूदगी में फैसला सुनाएगा? दिल्ली की एक्साइज पॉलिसी केस का यह नया मोड़ अब और भी दिलचस्प और पेचीदा हो गया है!


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