अशोक वाजपेयी : समय की आँखों में देखता कवि
आज, 16 जनवरी, हिंदी के वरिष्ठ कवि, आलोचक और संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी का जन्मदिन है। कविता, आलोचना और संस्कृति—तीनों क्षेत्रों में उनकी उपस्थिति दशकों से हिंदी साहित्य को समृद्ध करती रही है।
उनकी कविता संवेदना और विचार के बीच एक सधे हुए संवाद की तरह है—न ज़्यादा घोषणात्मक, न आत्ममुग्ध। “शहर अब भी संभावना है” से लेकर “कहीं नहीं वहीं” तक उनकी कविताएँ समय, अकेलेपन, स्मृति और मनुष्य की नैतिक बेचैनी को गहराई से दर्ज करती हैं।
एक आलोचक के रूप में वे बहुलता, असहमति और संवाद के पक्षधर रहे हैं। उनकी आलोचना साहित्य पर निर्णय सुनाने के बजाय उसे समझने और खुला रखने का आग्रह करती है। संस्कृतिकर्मी के रूप में भारत भवन, रज़ा फ़ाउंडेशन और अनेक संस्थाओं के माध्यम से उन्होंने कला और साहित्य को जीवन के बीचोंबीच लाने का काम किया।
अशोक वाजपेयी उन विरल रचनाकारों में हैं जिनके लिए साहित्य केवल लेखन नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विवेक और सांस्कृतिक ज़िम्मेदारी का अभ्यास है।
उनकी कविता समय की आंतरिक हलचलों को बिना शोर के, लेकिन गहरी स्पष्टता के साथ दर्ज करती है। अँधेरे, भय और नैतिक संकट के इस दौर में उनकी एक कविता विशेष रूप से याद आती है—
गाढ़े अँधेरे में —
इस गाढ़े अँधेरे में
यों तो हाथ को हाथ नहीं सूझता
लेकिन साफ़-साफ़ नज़र आता है :
हत्यारों का बढ़ता हुआ हुजूम,
उनकी ख़ूँख़्वार आँखें,
उसके ताज़े धारदार हथियार,
उनकी भड़कीली पोशाकें,
मारने-नष्ट करने का उनका चमकीला उत्साह,
उनके सधे-सोचे-समझे क़दम।
हमारे पास अँधेरे को भेदने की कोई हिकमत नहीं है
और न हमारी आँखों को अँधेरे में देखने का कोई वरदान मिला है।
फिर भी हमको यह सब साफ़ नज़र आ रहा है।
यह अजब अँधेरा है
जिसमें सब कुछ साफ़ दिखाई दे रहा है
जैसे नीमरोशनी में कोई नाटक के दृश्य।
हमारे पास न तो आत्मा का प्रकाश है
और न ही अंत:करण का कोई आलोक :
यह हमारा विचित्र समय है
जो बिना किसी रोशनी की उम्मीद के
हमें गाढ़े अँधेरे में गुम भी कर रहा है
और साथ ही उसमें जो हो रहा है
वह दिखा रहा है :
क्या कभी-कभार कोई अँधेरा समय रोशनी भी होता है?

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