82 सीटों के साथ भाजपा का निर्विवाद राज: तीसरी बार मुख्यमंत्री बनेंगे हिमंत बिस्वा सरमा

ब्रह्मपुत्र की लहरों ने एक बार फिर भगवा रंग को ही चुना है और गुवाहाटी की वादियों में आज सिर्फ एक ही नाम गूंज रहा है....हिमंत बिस्वा सरमा! 4 मई की यह तारीख असम के इतिहास में मील का पत्थर बन गई है। जी हां भाजपा ने असम में जीत की वो ऐतिहासिक हैट्रिक लगाई है, जिसने देश के बड़े-बड़े सियासी दिग्गजों को दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर कर दिया है। असम विधानसभा चुनाव 2026 के अंतिम परिणाम आ चुके हैं और हिमंत बिस्वा सरमा लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। भाजपा ने अकेले अपने दम पर 82 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया है, जो जादुई आंकड़े से 13 ज्यादा है। 

वहीं, भाजपा के नेतृत्व वाले NDA ने 126 सदस्यीय विधानसभा में विपक्ष का सूपड़ा साफ कर दिया है। जहाँ भाजपा को 82 सीटें मिलीं, वहीं सहयोगी असम गण परिषद को 9 और BPF को 10 सीटों पर जीत मिली है। दूसरी तरफ, दावों के पहाड़ खड़ी करने वाली कांग्रेस महज़ 19 सीटों पर सिमट गई है और बदरुद्दीन अजमल की AIUDF का तो पूरी तरह पत्ता साफ हो गया है! यह जीत केवल एक चुनाव की नहीं, बल्कि एक ऐसे पॉलिटिकल ब्लॉकबस्टर की है जिसके नायक हिमंत ने 'मामा' और 'मियां' जैसे शब्दों को सत्ता की ऐसी चाबी बना दिया, जिसे कांग्रेस का कोई भी ताला खोल नहीं पाया।

आपको बता दें असम में इस बार चुनाव रैलियों के नारों से नहीं, बल्कि दो जज्बाती शब्दों के इर्द-गिर्द लड़ा गया। हिमंत बिस्वा सरमा ने अपनी रणनीति को इन दो सिरों पर ऐसा कसा कि विपक्ष पूरी तरह चित हो गया। जाहिर है राजनीति में नेता अक्सर सेवक बनते हैं, लेकिन हिमंत परिवार बन गए। 'अरुणोदयी 2.0' और अन्य कैश ट्रांसफर योजनाओं ने उन्हें राज्य की लाखों महिलाओं का चहेता मामा बना दिया। जब चुनाव करीब आए, तो 40 लाख महिलाओं को दी गई 25 हजार रुपये की एकमुश्त मदद ने विपक्ष के महंगाई वाले नैरेटिव को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। महिलाओं ने झोली भरकर मामा को वोट दिया, क्योंकि उनके लिए यह सिर्फ योजना नहीं, बल्कि एक भाई का सहारा था। 

आपको बता दें अगर 'मामा' शब्द में प्यार था, तो 'मियां' शब्द का इस्तेमाल हिमंत ने एक धारदार हथियार की तरह किया। असमिया पहचान, लैंड जिहाद और अवैध घुसपैठ जैसे संवेदनशील मुद्दों पर उन्होंने सख्त छवि बनाई। उन्होंने खुलकर स्वदेशी असमिया संस्कृति की रक्षा की बात की और विपक्ष को 'मियां तुष्टीकरण' के कटघरे में खड़ा कर दिया। जिसने हिंदू और स्वदेशी मतदाताओं को भाजपा के पक्ष में लोहे की तरह एकजुट कर दिया। वहीं इस चुनाव ने एक और बात साफ कर दी कि जमीन पर मौजूदगी ही जीत दिलाती है। कांग्रेस की हार की स्क्रिप्ट भी उतनी ही दिलचस्प है जितनी भाजपा की जीत की। जी हां विपक्ष का मुख्य चेहरा गौरव गोगोई ज्यादा समय दिल्ली के गलियारों और संसद में भाषण देने में बिताते रहे। वहीं, हिमंत बिस्वा सरमा आधी रात को भी किसी निर्माणाधीन पुल या अस्पताल का मुआयना करते हुए दिखाई दिए। गौरव की 'हाई-फाई' राजनीति हिमंत के 'जमीनी जुड़ाव' के सामने फीकी पड़ गई।

वहीं वोटिंग से ठीक पहले कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन बोरा का किनारा करना और सांसद प्रद्युत बोरदोलोई का भाजपा में शामिल होना कांग्रेस के लिए आत्मघाती रहा। जनता के बीच संदेश गया कि जो पार्टी अपने दिग्गजों को नहीं संभाल सकती, वह प्रदेश क्या संभालेगी। जिसके बाद असम के चुनावी आंकड़ों ने 15 साल में जो पलटी मारी है, वह हैरान करने वाली है। 2011 में महज 5 सीटों पर रहने वाली भाजपा आज 82 सीटों के साथ असम की निर्विवाद शक्ति बन चुकी है। कांग्रेस का वोट शेयर जरूर बढ़ा है, लेकिन सीटों के मामले में वह 19 के फेर में ही फंसी रह गई। वहीं सबसे बड़ा उलटफेर बदरुद्दीन अजमल की पार्टी AIUDF का हाशिए पर जाना रहा। मुस्लिम मतदाताओं ने भाजपा को रोकने के लिए कांग्रेस का दामन थामा, लेकिन बदले में हिंदू वोटों का जो एकतरफा ध्रुवीकरण भाजपा की ओर हुआ, उसने कांग्रेस के सारे समीकरण बिगाड़ दिए।

जाहिर है असम विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजे केवल एक सरकार की वापसी नहीं हैं, बल्कि यह भारतीय राजनीति के एक नए मॉडल की सफलता है। यह मॉडल है...डेटा, डिलीवरी और डिस्कोर्स का। हिमंत बिस्वा सरमा ने साबित कर दिया कि एक नेता जो कांग्रेस की जड़ों से निकलकर आता है, वह भाजपा के हिंदुत्व फ्रेम में फिट ही नहीं होता, बल्कि उसका सबसे बड़ा फायरब्रांड चेहरा भी बन सकता है। आज जब असम में 85.96% मतदान के बाद कमल खिल चुका है, तो यह साफ है कि जनता ने जाति, माटी और भेटी की रक्षा के लिए हिमंत के संकल्प पर अपनी मुहर लगा दी है। कांग्रेस के लिए यह हार एक चेतावनी है कि केवल रैलियों और हवाई हमलों से चुनाव नहीं जीते जाते। असम की जीत ने पूर्वोत्तर में भाजपा के वैचारिक दबदबे को पत्थर की लकीर बना दिया है। हिमंत बिस्वा सरमा अब केवल एक मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर के निर्विवाद महाबली के रूप में स्थापित हो चुके हैं। 

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