असम विधानसभा में पेश हुआ UCC बिल, विपक्ष के हंगामे के बीच ऐतिहासिक कदम
असम से लेकर दिल्ली तक सियासी पारा चरम पर पहुंच गया है! असम की हिमंत बिस्व सरमा सरकार ने अपने सबसे बड़े और सबसे अहम चुनावी वादे को पूरा करने की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं। जी हां आज सोमवार 25 मई को असम विधानसभा में यूनिफॉर्म सिविल कोड, असम, 2026 बिल पेश कर दिया गया। कैबिनेट की हरी झंडी मिलने के बाद जैसे ही इस बिल को सदन के पटल पर रखा गया, वैसे ही विपक्ष ने हंगामा शुरू कर दिया। लेकिन दृढ़ इच्छाशक्ति के लिए मशहूर सीएम हिमंत ने साफ कर दिया है कि असम में अब सामाजिक न्याय और समानता का नया दौर शुरू होने जा रहा है। वहीं इस बिल के आते ही असम अब उत्तराखंड और गुजरात के बाद तीसरा ऐसा बीजेपी शासित राज्य बन गया है, जिसने देश में समान नागरिक संहिता को लागू करने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। संसदीय कार्यमंत्री अतुल बोरा ने जब इस विधेयक को सदन के सामने पढ़ा, तो यह साफ हो गया कि यह कानून असम की सामाजिक और राजनीतिक तस्वीर को हमेशा-हमेशा के लिए बदलने वाला है!
आपको बता दें असम का यह UCC बिल बेहद सख्त और कई मायनों में ऐतिहासिक है। इस बिल में दो ऐसी बड़ी बातें शामिल हैं, जिन्होंने सबसे ज्यादा ध्यान खींचा है:
पहला एक से ज्यादा शादी पर पूरी तरह बैन
इस कानून के लागू होते ही असम में किसी भी शख्स को एक से ज्यादा पत्नी रखने की इजाजत नहीं होगी। यानी अगर पहली पत्नी जिंदा है या उससे कानूनी तौर पर तलाक नहीं हुआ है, तो कोई भी व्यक्ति दूसरी शादी करने का ख्वाब भी नहीं देख सकता। असम में बहुविवाह प्रथा पर यह अब तक का सबसे करारा प्रहार है।
दूसरा लिव-इन रिलेशनशिप का होगा सरकारी हिसाब
असम में अब बिना शादी के एक साथ रहने वाले कपल्स को अपनी आजादी के साथ-साथ कानून का पालन भी करना होगा। अब ऐसे रिश्तों में रहने के लिए सरकार के पास रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य कर दिया गया है।
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने इस ऐतिहासिक बिल की बारीकियों को समझाते हुए साफ किया कि यह कानून किसी धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि इंसानी अधिकारों के हक में है। शादी के लिए लड़कों की न्यूनतम उम्र 21 साल और लड़कियों के लिए 18 साल ही रहेगी। हालांकि, शादी और रीति-रिवाज लोगों के अपने पारंपरिक तौर-तरीकों से ही संपन्न होंगे। वहीं महिलाओं के कानूनी अधिकारों की रक्षा के लिए शादी और तलाक का रजिस्ट्रेशन बेहद जरूरी कर दिया गया है, ताकि उन्हें गुजारा भत्ता और अन्य कानूनी हक आसानी से मिल सकें। वहीं लिव-इन रिलेशनशिप के अनिवार्य रजिस्ट्रेशन के पीछे सरकार का तर्क है कि इससे ऐसे रिश्तों से पैदा होने वाले बच्चों को समाज में कानूनी पहचान मिलेगी और उनके अधिकारों का हनन नहीं हो पाएगा। यह बिल बरसों पुराने उत्तराधिकार के कानून और संपत्ति के बंटवारे से जुड़े नियमों को आधुनिक और पारदर्शी बनाएगा। वहीं अब सवाल है कि इस बिल में किसे छूट मिलेगी? तो आपको बता दें हिमंत सरकार ने इस बिल में एक बहुत बड़ा और संवेदनशील प्रावधान रखा है। यह कानून असम की किसी भी 'अनुसूचित जनजाति' के लोगों पर लागू नहीं होगा। उनकी पारंपरिक व्यवस्था वैसी ही बनी रहेगी। सीएम हिमंत ने संविधान का हवाला देते हुए कहा कि....
"यह सिर्फ एक पॉलिसी नहीं है, बल्कि असम में समानता सुनिश्चित करने का एक प्रैक्टिकल टूल है। संविधान का अनुच्छेद 44 राज्यों को यूसीसी बनाने का अधिकार देता है और हम इसी अधिकार के तहत हर नागरिक को कानूनी स्पष्टता और संरक्षण देने जा रहे हैं।"
वहीं दूसरी तरफ जैसे ही संसदीय कार्यमंत्री अतुल बोरा ने विधेयक को सदन में रखा, विपक्ष का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के साथ-साथ रायजोर दल और तृणमूल कांग्रेस के विधायकों ने सदन में जमकर नारेबाजी की और विरोध प्रदर्शन किया। विपक्ष की मांग है कि इस बिल को इतनी जल्दबाजी में पास न किया जाए, बल्कि इस पर समाज के सभी पक्षकारों के साथ एक व्यापक चर्चा होनी चाहिए। दूसरी तरफ, बीजेपी के तेवर पूरी तरह साफ हैं। भाजपा विधायक विश्वजीत डिमरी ने विपक्ष के विरोध को दरकिनार करते हुए आत्मविश्वास से कहा कि, "यह बिल इसी चालू सत्र में पेश भी किया जाएगा और भारी बहुमत से पारित भी होगा। इसके तुरंत बाद इसे पूरे राज्य में लागू कर दिया जाएगा।"
जाहिर है मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने पहले ही यानी 13 मई को मीडिया के सामने यह ऐलान कर दिया था कि वे 25 मई को विधानसभा में UCC बिल लाकर रहेंगे, और उन्होंने अपना वादा पूरा कर दिखाया। इस बिल के विधानसभा में आने के बाद असम की राजनीति का तापमान सातवे आसमान पर पहुंच गया है। जहां बीजेपी इसे सामाजिक सुधार, महिला सशक्तिकरण और तुष्टिकरण के खिलाफ एक बड़ा कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे ध्रुवीकरण का हथियार करार दे रहा है। ऐसे में अब देखना बेहद दिलचस्प होगा कि विपक्ष के भारी विरोध और हंगामे के बीच यह बिल सदन से कितनी जल्दी पास होता है। लेकिन एक बात तो शीशे की तरह साफ है कि हिमंत बिस्व सरमा ने 'असम यूसीसी बिल 2026' के जरिए एक ऐसी राजनीतिक बिसात बिछा दी है, जिसने विरोधियों को चारों खाने चित कर दिया है। अब देखना होगा कि असम की जनता इस समानता के कानून पर अपनी मुहर लगाती है या फिर विपक्ष का यह विरोध असम की सड़कों पर कोई नया सियासी संग्राम खड़ा करता है!

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