13 दिन की सरकार से 5 साल के सफर तक! अटल बिहारी वाजपेयी की PM बनने की कहानी

राजनीति में गिरकर दोबारा उठना क्या होता है? इसकी मिसाल हैं अटल बिहारी वाजपेयी!

सोचिए, कोई नेता पहली बार प्रधानमंत्री बने और सिर्फ 13 दिन में उसकी सरकार गिर जाए। फिर वह दोबारा सत्ता में आए, लेकिन इस बार भी सरकार ज्यादा समय तक न टिके। क्या वह तीसरी बार वापसी कर सकता है? 

अटल बिहारी वाजपेयी की राजनीतिक कहानी कुछ ऐसी ही रही। इसमें है सत्ता का उतार-चढ़ाव, गठबंधन की चुनौतियाँ और भारतीय लोकतंत्र का एक दिलचस्प अध्याय।

तीन बार PM बनने का पूरा सफर

पहली पारी — सिर्फ 13 दिन!

16 मई 1996 को अटल बिहारी वाजपेयी ने पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। लेकिन लोकसभा में बहुमत साबित न कर पाने के कारण उनकी सरकार 13 दिन में ही गिर गई। शुरुआत छोटी थी, मगर कहानी अभी बाकी थी!

दूसरी पारी — 13 महीने का कार्यकाल

19 मार्च 1998 को वाजपेयी दूसरी बार प्रधानमंत्री बने। उनकी सरकार ने कई अहम फैसले लिए, लेकिन अप्रैल 1999 में विश्वास मत के दौरान सिर्फ एक वोट से हार गई। एक वोट ने सरकार का भविष्य बदल दिया!

तीसरी पारी — इस बार पूरे पाँच साल! 

13 अक्टूबर 1999 को अटल बिहारी वाजपेयी ने तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। इस बार राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की सरकार ने 2004 तक अपना कार्यकाल पूरा किया।

यानी जिस नेता की पहली सरकार सिर्फ 13 दिन चली थी, उसी ने तीसरी पारी में पाँच साल तक देश का नेतृत्व किया। यही इस राजनीतिक सफर का सबसे दिलचस्प मोड़ है।

वाजपेयी सरकार में क्या-क्या हुआ?

उनका तीसरा कार्यकाल सिर्फ सत्ता में बने रहने की कहानी नहीं था। इस दौरान देश ने कई बड़े घटनाक्रम देखे।

  • सड़क और कनेक्टिविटी: स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना के जरिए दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता जैसे प्रमुख शहरों को बेहतर राजमार्गों से जोड़ने का काम आगे बढ़ा।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा: 1999 के कारगिल युद्ध के बाद सुरक्षा से जुड़े मुद्दे राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में रहे।
  • विदेश नीति: पाकिस्तान के साथ शांति की कोशिशें हुईं, लेकिन दोनों देशों के रिश्तों में तनाव भी बना रहा।
  • गठबंधन की राजनीति: अलग-अलग दलों को साथ लेकर सरकार चलाना उनके कार्यकाल की बड़ी चुनौती थी।

सिर्फ नेता नहीं, अपनी अलग पहचान रखने वाले राजनेता

अटल बिहारी वाजपेयी अपनी दमदार भाषण शैली, कविताओं और संसदीय संवाद के लिए जाने जाते थे। उनकी पहचान इस बात से भी बनी कि वे राजनीतिक मतभेदों के बावजूद बातचीत और संवाद को महत्व देते थे।

आज की Gen-Z की भाषा में कहें तो उनकी राजनीतिक यात्रा में कई plot twists थे—पहली सरकार का जल्दी गिरना, दूसरी सरकार का एक वोट से हारना और फिर तीसरी बार पाँच साल का कार्यकाल पूरा करना!

वाजपेयी का राजनीतिक सफर बताता है कि लोकतंत्र में सिर्फ प्रधानमंत्री बनना ही महत्वपूर्ण नहीं होता; लोकसभा में समर्थन जुटाना, सहयोगी दलों के साथ तालमेल बनाना और सरकार चलाना भी उतना ही अहम है।

उनकी तीसरी पारी भारतीय राजनीति में गठबंधन सरकारों के महत्व को समझने का एक खास उदाहरण है।

13 दिन, 13 महीने और फिर पाँच साल—अटल बिहारी वाजपेयी की यह राजनीतिक यात्रा भारतीय लोकतंत्र के उन अध्यायों में शामिल है, जिन्हें जानना हर युवा के लिए दिलचस्प हो सकता है। 

क्योंकि इतिहास सिर्फ तारीखों से नहीं बनता, उसके पीछे छिपे फैसलों, चुनौतियों और बदलावों से भी बनता है!

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