क्या ऑस्ट्रेलिया भारत की ऊर्जा सुरक्षा को देगा नई मजबूती? पीएम मोदी की यात्रा में यूरेनियम समझौते पर टिकी निगाहें

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जल्द ही ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर जाने वाले हैं। इस यात्रा के दौरान भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच यूरेनियम आपूर्ति से जुड़े लंबे समय से लंबित व्यावसायिक समझौते पर महत्वपूर्ण प्रगति होने की संभावना जताई जा रही है। यदि यह समझौता आगे बढ़ता है, तो भारत की बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताओं और परमाणु ऊर्जा विस्तार की योजनाओं को बड़ा समर्थन मिल सकता है।

2014 के समझौते के बाद अब व्यावसायिक डील की उम्मी

भारत और ऑस्ट्रेलिया ने वर्ष 2014 में नागरिक परमाणु सहयोग समझौते (Civil Nuclear Cooperation Agreement) पर हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद से दोनों देशों के बीच यूरेनियम की व्यावसायिक आपूर्ति को लेकर बातचीत जारी है। अब माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी की ऑस्ट्रेलिया यात्रा के दौरान इस दिशा में ठोस प्रगति देखने को मिल सकती है।

प्रधानमंत्री 6 से 11 जुलाई तक इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड की तीन देशों की यात्रा पर रहेंगे, जिसमें ऊर्जा सहयोग भी प्रमुख एजेंडे का हिस्सा माना जा रहा है।

द्विपक्षीय समझौते को लागू करने पर हो रही चर्चा

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव (इंडो-पैसिफिक) विश्वेश नेगी ने कहा कि भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच परमाणु ईंधन आपूर्ति को लेकर द्विपक्षीय व्यवस्था पहले से मौजूद है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसे लागू नहीं किया जा सका। उन्होंने बताया कि दोनों देशों के बीच हाल के समय में भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए महत्वपूर्ण बातचीत हुई है और उम्मीद है कि इसका सकारात्मक परिणाम सामने आएगा।

हालांकि, फिलहाल किसी अंतिम निर्णय की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और दोनों पक्षों के बीच बातचीत जारी है। माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज की मुलाकात के दौरान इस विषय पर आगे की दिशा तय हो सकती है।

भारत के लिए यूरेनियम क्यों बन गया है रणनीतिक आवश्यकता?

भारत ने वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य तय किया है। इसके साथ ही सरकार देश को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित डेटा सेंटरों का वैश्विक केंद्र बनाने पर भी जोर दे रही है। बड़े पैमाने पर डेटा सेंटर स्थापित करने के लिए लगातार और भरोसेमंद बिजली की आवश्यकता होगी, जिसे पूरा करने में परमाणु ऊर्जा महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इसी कारण यूरेनियम की उपलब्धता भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम होती जा रही है।

ऑस्ट्रेलिया पर क्यों है भारत की खास नजर?

भारत ने अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमता को 63,000 मेगावाट तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। इस महत्वाकांक्षी योजना को पूरा करने के लिए लगभग 85 अरब डॉलर के निवेश और पर्याप्त मात्रा में यूरेनियम भंडार की आवश्यकता होगी।

ऑस्ट्रेलिया दुनिया के सबसे बड़े यूरेनियम भंडार वाले देशों में शामिल है। यही वजह है कि भारत लंबे समय से ऑस्ट्रेलिया के साथ नागरिक परमाणु सहयोग समझौते को व्यावहारिक रूप से लागू करने और नियमित यूरेनियम आपूर्ति सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास कर रहा है।

2047 तक कई गुना बढ़ सकती है यूरेनियम की मांग

वर्तमान में भारत की वार्षिक यूरेनियम आवश्यकता लगभग 1,500 से 2,000 टन के बीच है। अनुमान है कि यदि देश वर्ष 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता हासिल करता है, तो यूरेनियम की सालाना मांग बढ़कर लगभग 5,400 टन तक पहुंच सकती है।

आयात पर निर्भर है भारत

भारत में उपलब्ध यूरेनियम अयस्क की गुणवत्ता अपेक्षाकृत कम मानी जाती है और इसके खनन की लागत भी अधिक है। इसी कारण देश अपनी कुल यूरेनियम आवश्यकता का लगभग 70 से 75 प्रतिशत हिस्सा कनाडा, कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान और रूस जैसे देशों से आयात करता है। ऐसे में यदि ऑस्ट्रेलिया से भी नियमित आपूर्ति शुरू होती है, तो भारत के लिए ईंधन स्रोतों में विविधता आएगी और ऊर्जा सुरक्षा को अतिरिक्त मजबूती मिल सकती है।

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