पंचायत राज्य एक्ट नियमावली में बड़ा खेल

अयोध्या : भारत में उद्योगपतियों के लिए सुनहरा मौका ग्राम प्रधान व प्रमुख चुनाव में आरक्षित सीट के प्रत्याशियों पर चुनाव जीतने के लिए पूंजी लगाये प्रत्याशी जिताएं और करोड़ों रुपया कमाएं।फैक्ट्री कारखाना छोड़कर राजनीति में पूंजी लगाऐं

और माला माल हों। भारत सरकार ने आरक्षण की  व्यवस्था बनाई है। विदित हो  पंचायत राज्य एक्ट नियमावली में फेर बदल करते हुए पूर्व से ही आरक्षण लागू किया गया है। सामान्य, ओबीसी, हरिजन, आदि सीटें परिसीमन के आधार पर आरक्षित होती रहती हैं। जिसमें आरक्षित सीट पर सामान्य वर्ग नहीं लड़ सकता। पूंजी के अभाव में आरक्षित वर्ग चुनाव नहीं जीत पाता क्योंकि करोड़ का वारा न्यारा होता है ऐसे में उद्योगपतियों के लिए सुनहरा मौका मौका हाथ से खाली न जाने दें। इस खेल में लाल फीताशाही व सरकार अपरोक्ष रूप से आपकी मदद भी करेगी।
आप देख रहे होंगे कि तमाम ऐसे ब्लॉक तहसील ग्राम सभा क्षेत्र में आरक्षित सीट पर सरकार ने व्यवस्था किया था कि सबको मौका मिले। लेकिन उनकी सीट पर पूंजी लगाकर प्रत्याशी खड़े कर लोग मालामाल हो रहे हैं। सरकार उक्त खेल में परोक्ष रूप से शामिल है नहीं तो ऐसी व्यवस्था पर अंकुश लगाती।

पंचायत चुनाव में आरक्षित सीटों का हो रहा सौदा, पूंजीपति उठा रहे फायदा

पंचायत चुनाव में सामाजिक न्याय के लिए आरक्षित की गई सीटें अब पूंजी के खेल में फंसती दिख रही हैं। गरीब और वंचित वर्ग के उम्मीदवारों के पास चुनाव लड़ने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं होते, जिसका फायदा बड़े पूंजीपति और दबंग लोग उठा रहे हैं।

कैसे होता है खेल:
1. पूंजी लगाकर टिकट दिलवाना: आरक्षित वर्ग के जरूरतमंद व्यक्ति को चुनाव लड़ने के लिए बड़े लोग पैसा, गाड़ी, प्रचार का पूरा खर्च देते हैं।
2. जीत के बाद हाईजैक: चुनाव जीतते ही असली नियंत्रण फाइनेंस करने वाले के हाथ में चला जाता है। प्रधान या सदस्य सिर्फ कागजों पर रह जाता है।
3. करोड़ों का खेल: इसके बाद पंचायत में आने वाले विकास कार्यों, ठेकों, जमीनों के पट्टों में भारी कमीशनखोरी होती है। एक अनुमान के मुताबिक एक ब्लॉक प्रमुख या प्रधान की सीट पर कब्जा कर करोड़ों की कमाई की जाती है।

सामाजिक न्याय पर सवाल:  
आरक्षण का मकसद था कि एससी, एसटी, ओबीसी और महिला वर्ग को नेतृत्व का मौका मिले। लेकिन पूंजी के अभाव में आरक्षित वर्ग के लोग खुद फैसले नहीं ले पा रहे। गांव की सरकार चलाने का अधिकार परोक्ष रूप से पैसे वालों के पास चला जा रहा है।

सरकार की चुप्पी:  
चुनाव आयोग और प्रशासन के नियम कहते हैं कि प्रलोभन देना अपराध है, लेकिन जमीनी हकीकत में इस व्यवस्था पर रोक नहीं लग पा रही है। न खर्च की सीमा का पालन होता है, न बेनामी फंडिंग की जांच। विपक्ष और सामाजिक संगठन लंबे समय से मांग कर रहे हैं कि आरक्षित सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए सरकार अलग से आर्थिक मदद दे या फंडिंग पर सख्त निगरानी हो, ताकि आरक्षण का मूल उद्देश्य बचा रहे।

ग्रामीणों का कहना है कि जब तक पूंजी का खेल नहीं रुकेगा, तब तक पंचायतों में असली लोकतंत्र और सामाजिक न्याय सिर्फ कागजों पर ही रह जाएगा।

रिपोर्टर : आईबी सिंह

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