लोकतंत्र के चार स्तंभों पर सवाल कागज पर इस लेख को एक बार अवश्य ध्यान से पढ़ें
देश की कानूनी व्यवस्था और लोकतंत्र का ढांचा आज चौराहे पर खड़ा है। लोग पूंछ रहे हैं आखिर सर्वोच्च कौन है कार्यपालिका, न्यायपालिका, विधायिका या पत्रकारिता संविधान कहता है चारों का संतुलन ही सर्वोच्च है। विधायिका कानून बनाती है। संसद और विधानसभा में बैठे सांसद-विधायक कानून पास करते हैं। शक्ति यहीं से शुरू होती है। कार्यपालिका यानी PM, CM, DM, SP, कलेक्टर और पुलिस उस कानून को जमीन पर लागू करती है। प्रैक्टिकल में सबसे ज्यादा लाठी-डंडे की पावर इसी के पास है। न्यायपालिका यानी सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट उस कानून की रक्षा करती है। अगर विधायिका और कार्यपालिका गलत करे तो उसे रद्द करने की ताकत सिर्फ न्यायपालिका के पास है।
इसलिए कागज पर सबसे सर्वोच्च न्यायपालिका ही है। और पत्रकारिता चौथा स्तंभ है अगर ये न हो तो बाकी तीनों बेईमान हो जाएं कलम में वो ताकत है जिससे सरकारें डरती हैं। लेकिन आज की राजनीति ने इस संतुलन को बिगाड़ दिया है।पहले की राजनीति और आज की राजनीति में जमीन-आसमान का अंतर है पहले शिक्षा का अभाव था नेता जो कहते थे जनता मान लेती थी। आज हिंदू हो मुस्लिम हो दलित भाई हो सभी के बच्चे पढ़ लिखकर जागरूक हो रहे हैं। ये Facebook, WhatsApp, Instagram, Twitter का जमाना है। एक झूठ बोलोगे जनता 2 मिनट में आपकी कलई खोल देगी।आज राजनीतिक पार्टियां सिर्फ जातीय मतभेद फैलाकर, लोक-लुभावने नारों से वोट लेना चाहती हैं
जरा सोचिए क्या कोई भी बड़ा नेता एक जाति के भरोसे प्रधान, BDC, विधायक, सांसद, ब्लॉक प्रमुख, जिला पंचायत अध्यक्ष का भी चुनाव जीत सकता है कभी नहीं! फिर क्यों जातियों में विध्वंस और विघटन की भावना फैला रहे हो? देश में कार्यपालिका न्यायपालिका विधायिका और पत्रकारिता चारों जिंदा हैं
नियमावली को ध्यान से देखो और अपने अंदर सुधार लाओ समय की मांग है कि सभी राजनीतिक पार्टियां आर्थिक आधार पर आरक्षण का समर्थन करें। जाति नहीं, गरीबी देखो तभी एक भारत श्रेष्ठ भारत बनेगा, सभी जातियों को समान अधिकार मिलेगा और भाईचारा कायम रहेगा।
रिपोर्टर - आई.बी. सिंह
No Previous Comments found.