राम मंदिर चढ़ावा घोटाला! मोजों-जूतों में भरकर चोरी, ट्रस्ट में मचा हड़कंप
अब बात करते हैं अयोध्या के भव्य राम मंदिर की...जहां प्रभु राम की प्राण प्रतिष्ठा के बाद देश-विदेश से करोड़ों श्रद्धालुओं ने जिस श्रद्धा से अपना खून-पसीने का पैसा दानपात्र में डाला, उसी चढ़ावे पर कुछ भ्रष्टाचारियों की गंदी नजर लग चुकी थी! यह सिर्फ चंद रुपयों की हेराफेरी का मामला नहीं है, बल्कि देश के सबसे बड़े धार्मिक सांस्कृतिक केंद्र के भरोसे पर लगा वो गहरा दाग है, जिसने दिल्ली से लेकर लखनऊ तक की सियासत और संतों के गलियारे में भूचाल ला दिया है। 6 जुलाई 2026 का वो दिन इतिहास में दर्ज हो गया, जब श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की 3 घंटे चली आपातकालीन बैठक में वो हुआ जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। ट्रस्ट के सबसे बड़े चेहरे महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा को नैतिक आधार पर अपना इस्तीफा सौंपना पड़ा। लेकिन असली कहानी इन इस्तीफों के पीछे छिपी है। उत्तर प्रदेश सरकार की SIT की जो रिपोर्ट सामने आई है, वो रोंगटे खड़े कर देने वाली है। आखिर कैसे मोजे और जूतों में भरकर रामलला का चढ़ावा चुराया जा रहा था? कैसे नियमों को ताक पर रखकर चंपत राय के ड्राइवर के पास खजाने की चाबियां थीं? और सबसे बड़ा सवाल जब सारा घपला हो रहा था, तो ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरी क्या कर रहे थे? आइए, इस इनसाइड स्टोरी के एक-एक पन्ने को खोलते हैं!
आपको बता दें इस पूरे महा-घोटाले का भंडाफोड़ तब हुआ जब मंदिर के ही एक पूर्व अकाउंट्स सुपरवाइजर ने दान में भारी गड़बड़ी की शिकायत की। इसके बाद यूपी सरकार ने आनन-फानन में 14 जून 2026 को तीन सदस्यीय SIT का गठन किया। जब SIT ने 27 अप्रैल से 5 जून 2026 के बीच के CCTV फुटेज खंगाले, तो अधिकारियों की आंखें फटी की फटी रह गईं! कोई एक-दो बार नहीं, बल्कि पूरे 70 बार कैमरों में कैद हुआ कि नोटों की गिनती करने वाले कर्मचारी कितनी चालाकी से रामलला के चढ़ावे पर हाथ साफ कर रहे थे। ये चालाक चोर नोटों की गड्डियां और खुले पैसे अपने कपड़ों, जेबों, मोजों और जूतों में छिपाकर काउंटिंग रूम से बाहर ले जा रहे थे। हद तो तब हो गई जब काउंटिंग रूम से सटे एक वॉशरूम की तलाशी ली गई, तो वहां से भी 2.25 लाख रुपए नकद बरामद हुए! SIT ने इस मामले में 6 मुख्य आरोपियों को दबोचा है। जिसमें...
अविनाश शुक्ला...आरोपी नंबर 1 और मुख्य मास्टरमाइंड
अनुकल्प मिश्रा
लवकुश मिश्रा
मनीष कुमार यादव
करुणेश पांडे
रामाशंकर मिश्रा शामिल हैं।
जब मुख्य आरोपी अविनाश शुक्ला के घर और ठिकानों पर रेड मारी गई, तो पुलिस के भी होश उड़ गए। उसके पास से 20.39 लाख रुपए कैश, 1,121 अमेरिकी डॉलर, सोने-जांदी के भारी जेवरात और एक चमचमाती SUV कार बरामद हुई। इन सभी आरोपियों से अब तक कुल 79 लाख रुपए से ज्यादा की नकदी और जेवरात जब्त किए जा चुके हैं। यह चोरी पिछले कई महीनों या शायद सालों से चल रही थी और अंदेशा है कि यह घोटाला करोड़ों रुपये का हो सकता है! अब आप सोच रहे होंगे कि इन मामूली चोरों की इतनी हिम्मत कैसे हुई कि देश के सबसे VVIP मंदिर के खजाने में डाका डाल दें? तो सुनिए, इसके पीछे था रसूख और सिफारिश का वो खेल जिसने पूरे सिस्टम को खोखला कर दिया। जी हां SIT की रिपोर्ट के मुताबिक, ये सभी 6 आरोपी किसी प्रतियोगी परीक्षा या कड़े बैकग्राउंड चेक से नहीं आए थे। इन्हें स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की आउटसोर्स एजेंसी 'सैनिक सिक्योरिटी सर्विसेज' के जरिए रखा जरूर गया था, लेकिन इसके पीछे ट्रस्ट के ही बड़े पदाधिकारियों की मजबूत सिफारिश थी! चौंकाने वाला खुलासा यह हुआ कि आरोपी मनीष कुमार यादव की सिफारिश किसी और ने नहीं, बल्कि उसके सगे चाचा रामाशंकर यादव उर्फ टिन्नू ने की थी। अब ये टिन्नू कौन हैं? तो आपको बता दें टिन्नू कोई बड़े अफसर नहीं, बल्कि पूर्व महासचिव चंपत राय के पर्सनल ड्राइवर थे! लेकिन चंपत राय के करीबी होने के नाते टिन्नू का रसूख ऐसा था कि बिना किसी आधिकारिक या लिखित आदेश के, मंदिर के सभी दानपात्रों की चाबियां इसी टिन्नू ड्राइवर के पास रहती थीं। करोड़ों का चढ़ावा आने वाले मंदिर में चाबियां मौखिक आधार पर एक ड्राइवर को सौंप दी गईं! फिलहाल टिन्नू यादव को गिरफ्तार किया जा चुका है और उसके खिलाफ राम जन्मभूमि पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज है।
वहीं इस पूरे कांड में पूर्व महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी गोपाल राव के खिलाफ भले ही सीधे पुख्ता सबूत न मिले हों, लेकिन ट्रस्ट के कद्दावर सदस्य अनिल मिश्रा के चारों तरफ पुलिस और SIT ने अपना शिकंजा पूरी तरह कस दिया है। सूत्रों की मानें तो पुलिस उन्हें जल्द ही मुख्य आरोपियों की लिस्ट में जोड़ने वाली है। वहीं SIT की रिपोर्ट में वो कौन से 5 बड़े विलेन वाले कारण हैं, जो अनिल मिश्रा को सीधे कटघरे में खड़ा करते हैं? आइए देखते हैं।
मंदिर के पूरे फाइनेंशियल मैटर और नकद राशि को संभालने वाले मुख्य कर्ता-धर्ता अनिल मिश्रा ही थे।
दान की गिनती पूरी पारदर्शिता और तय नियमों से हो, इसकी सीधी जिम्मेदारी अनिल मिश्रा के कंधों पर थी, जिसे उन्होंने नहीं निभाया।
SBI के साथ मिलकर दान गिनने के जो कड़े नियम बने थे, उसमें ट्रस्ट के नुमाइंदे अनिल मिश्रा ही थे। लेकिन उन्होंने इन नियमों को कभी गंभीरता से नहीं लिया।
कर्मचारियों की बायोमीट्रिक अटेंडेंस, तलाशी और बिना जेब वाली ड्रेस के सख्त नियमों को अनिल मिश्रा ने अपने रसूख से ढीला कर दिया। इसी का फायदा उठाकर चोरों ने मोजे-जूतों में नोट भरे।
बैंक बार-बार सुरक्षा में कमी के अलर्ट भेज रहा था, लेकिन मिश्रा ने हर चेतावनी को नजरअंदाज किया।
यही नहीं, इस गबन के तार सिर्फ ट्रस्ट तक नहीं जुड़े हैं, बल्कि स्टेट बैंक के 3 से 4 अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत के भी पुख्ता सबूत मिले हैं, जिन्हें पुलिस जल्द ही दबोचने वाली है। दरअसल, इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प और हैरान करने वाला पहलू हैं ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरी! जब 6 जुलाई की आपात बैठक खत्म हुई, तो गोविंद देव गिरी ही मीडिया के सामने आए और बड़े ठाट से सारी जानकारी साझा की। उन्होंने बड़े गर्व से बताया कि चंपत राय और अनिल मिश्रा ने नैतिक आधार पर इस्तीफा दे दिया है और वो अब ट्रस्ट के सदस्य नहीं रहे। उन्होंने चंपत राय को क्लीनचिट देने में भी देर नहीं लगाई। लेकिन जनता और सियासी गलियारों में अब सबसे बड़ा और तीखा सवाल ये तैर रहा है कि जब आप खुद ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष यानी खजांची थे, तो कोष का सारा काम महासचिव चंपत राय और सदस्य अनिल मिश्रा कैसे संभाल रहे थे? एक कोषाध्यक्ष के नाते जब वो अपनी बुनियादी जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह फेल रहे, जब उनकी नाक के नीचे करोड़ों का चढ़ावा मोजों में भरकर जा रहा था, तब वो कहां थे? अपनी नाकामी छुपाकर दूसरों को क्लीनचिट बांटने का अधिकार उन्हें किसने दिया? क्या कोषाध्यक्ष सिर्फ एक रबर स्टैंप बनकर रह गए थे? यह सवाल आज हर रामभक्त पूछ रहा है।
देखा जाए तो भले ही ट्रस्ट ने आनन-फानन में चंपत राय का इस्तीफा ले लिया, गोपाल राव को विशेष आमंत्रित सूची से हटा दिया और उनकी जगह उस कृष्ण मोहन को अंतरिम महासचिव बना दिया, जिन्होंने इस मामले में पहली बार FIR दर्ज कराई थी। साथ ही पहली बार CEO का पद बनाकर तीन सदस्यीय सर्च कमेटी गठित कर दी। लेकिन क्या सिर्फ चेहरे बदलने से राम मंदिर का खजाना सुरक्षित हो जाएगा? बिल्कुल नहीं! क्योंकि खराबी व्यक्तियों में नहीं, बल्कि ट्रस्ट के पूरे प्रशासनिक ढांचे में है। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद केंद्र सरकार द्वारा एक स्वतंत्र प्राइवेट ट्रस्ट के रूप में किया गया था। इसके पास कोई वैधानिक या अर्ध-सरकारी प्रशासनिक ढांचा नहीं है। यहां फैसले चंद संतों और धार्मिक नेताओं की आपसी सहमति और रसूख से होते हैं, किसी नियम-कायदे से नहीं। तिरुपति बालाजी या माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड जैसे देश के अन्य बड़े मंदिर किसी मनमर्जी के ट्रस्ट से नहीं चलते। वे राज्य सरकारों के विशेष अधिनियमों के तहत चलते हैं। जैसे तिरुपति मंदिर 'आंध्र प्रदेश धर्मार्थ और हिंदू धार्मिक संस्थान और बंदोबस्त अधिनियम' के तहत काम करता है, जहां IAS स्तर का अधिकारी CEO होता है। वहां नियम, पारदर्शिता और जवाबदेही कानून के दायरे में होती है, न कि राम मंदिर की तरह जहां एक महासचिव और एक मेंबर ही खुद को राजा, CEO और कोषाध्यक्ष समझ बैठे थे! आपको बता दें ये मामला सिर्फ चोरी तक सीमित नहीं है, अब इसमें कड़ा राजनीतिक तड़का भी लग चुका है। 6 जून 2025 को केंद्रीय सूचना आयोग ने गृह मंत्रालय के रुख के आधार पर एक फरमान सुनाया था कि राम मंदिर ट्रस्ट RTI के दायरे में नहीं आता, क्योंकि यह सरकार के स्वामित्व में नहीं है और इसके दस्तावेज गोपनीय' हैं। अब इसी मुद्दे पर CPI(M) के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को एक कड़ा पत्र लिखकर इस फैसले को चुनौती दे डाली है।
देखा जाए तो राम मंदिर ट्रस्ट द्वारा उठाए गए कदम, जैसे चंपत राय को हटाना, नए अंतरिम महासचिव की नियुक्ति और CEO पद का सृजन...महज एक कामचलाऊ व्यवस्था जैसा लगता है। ऐसा लग रहा है कि ट्रस्ट अपनी छवि पर आए भारी दबाव और 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तपिश को देखते हुए केवल डैमेज कंट्रोल में जुटा है। लेकिन जनता अब जाग चुकी है। जब तक राम मंदिर ट्रस्ट अपने इस पुराने, लचर और रसूखदार मठ वाले ढांचे को पूरी तरह छोड़कर तिरुपति या वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड की तरह एक आधुनिक, पारदर्शी, और लीगल कॉर्पोरेट गवर्नेंस मॉडल नहीं अपनाता, तब तक चोरों के लिए मोजे और जूते में नोट छुपाने की गुंजाइश बनी रहेगी। सुधार की शुरुआत चेहरों को बदलने से नहीं, बल्कि एक ऐसा अभेद्य और फुल-प्रूफ डिजिटल और लीगल सिस्टम बनाने से होगी, जिसके भीतर परिंदा भी पर न मार सके। अब देखना होगा कि नए अंतरिम महासचिव कृष्ण मोहन और आने वाले नए CEO इस ऐतिहासिक मंदिर को कलंक से मुक्ति दिला पाते हैं या नहीं!
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