बिना तामझाम के चले यूपी के एक साल के मुख्यमंत्री बाबू बनारसी दास
राज्यसभा में सभापति और उप-सभापति होते हैं, जो सदस्यों को शपथ दिलाते हैं। लेकिन जब दोनों अनुपस्थित हों, तब प्रोटेम चेयरमैन ही सदस्यों को शपथ दिलाता है। भारत के इतिहास में केवल एक बार ऐसा हुआ जब प्रोटेम चेयरमैन ने सदस्यों को शपथ दिलाई — वो थे बाबू बनारसी दास।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में बाबू बनारसी दास ने एक साल से भी कम समय तक शासन किया, लेकिन बिना किसी तामझाम के अपनी सरकार चलाने का जो रुतबा उन्होंने बनाया, वह आज भी चर्चा का विषय है। उन्होंने सरकारी कोठी की जगह लखनऊ के कैंट स्थित अपने निजी आवास में रहना पसंद किया और यहीं से बड़े फैसले लिए।
बाबू बनारसी दास का जन्म 8 जुलाई 1912 को बुलंदशहर जिले के अतरौली गांव में हुआ था। मात्र 16 वर्ष की उम्र में उन्होंने कन्या पाठशाला स्थापित की, जहां वे स्वयं पढ़ाते थे। गांधीजी से प्रेरित होकर उन्होंने छुआछूत मिटाने की कसम खाई, जिसके कारण परिवार और गांव वालों ने उनका बहिष्कार कर दिया।
1928 में नौजवान भारत सभा और कांग्रेस के सक्रिय सदस्य बने, उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में साहसिक भूमिका निभाई। 1930 में गुलावठी गोलीकांड के दौरान उनकी नेतागिरी में आयोजित शांतिपूर्ण सभा पर पुलिस ने गोलीबारी की, जिसमें 8 लोग शहीद हुए और सैकड़ों गिरफ्तार हुए। जेल में भी उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, लाल बहादुर शास्त्री जैसे नेताओं के संपर्क में रहे।
1946 में बुलंदशहर से निर्विरोध विधायक चुने गए और कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भी बने। यूपी में 1962 से 1966 तक सूचना, श्रम, सहकारिता, बिजली, सिंचाई और संसदीय कार्य मंत्री के रूप में उन्होंने कई महत्वपूर्ण योजनाएं शुरू कीं। सूचना विभाग के जरिए जिलावार स्वतंत्रता सेनानियों का विवरण प्रकाशित करवाया।
28 फरवरी 1979 से 18 फरवरी 1980 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे बाबू बनारसी दास ने मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए भी सरकारी कोठी में न रहकर अपने कैंट स्थित आवास को प्राथमिकता दी। उनकी सादगी, देशभक्ति और जनसेवा का जज्बा आज भी यूपी की राजनीति में मिसाल माना जाता है।
1980 के विधानसभा चुनाव में हार के बाद उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया। 3 अगस्त 1985 को उनका निधन हुआ। बाबू बनारसी दास का जीवन संघर्ष, सरलता और समर्पण की जीवंत मिसाल है, जो आज भी उनकी यादें ताजा करता है।
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