कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे जी द्वारा हल्द्वानी में एक जनसभा को संबोधित करने के बाद भाजपा-आरएसएस के मुखौटों ने उस स्थान का तथाकथित “शुद्धिकरण” किया -वफाती मियां ।
बदायूँ वफाती मियां ने विचार रखते हुए विरोध प्रदर्शित करते हुए कहा यह घटनाएं हर भारतीय का खून खौला देने वाली घटना है कि एक दलित नेता की उपस्थिति के बाद शुद्धिकरण!
आखिर “अपवित्र” क्या हुआ था—वह मंच या भाजपा-आरएसएस की वह मानसिकता, जो आज भी किसी दलित को सिर ऊंचा करके खड़े होते, सम्मान पाते और अपनी सत्ता को चुनौती देते हुए बर्दाश्त नहीं कर सकती?
नारों और धार्मिक भावनाओं का बहाना बनाकर भारत की बुद्धि का अपमान मत कीजिए। नारों पर आपत्ति है तो उनकी निंदा कीजिए। लेकिन खरगे जी के उस मंच पर खड़े होने के बाद “शुद्धिकरण” की आवश्यकता क्यों पड़ी? यह कोई धार्मिक अनुष्ठान नहीं था। यह जातिवादी नफरत का एक सोचा-समझा और सार्वजनिक प्रदर्शन था—घृणित, कुटिल और किसी भी परिस्थिति में अक्षम्य।
भाजपा ने इस कायरतापूर्ण व्यवस्था में महारत हासिल कर ली है। उसके मुखौटे जहर फैलाते हैं, उसके प्रवक्ता बहाने गढ़ते हैं और प्रधानमंत्री चुप्पी के पीछे छिप जाते हैं। नरेंद्र मोदी कैमरों के सामने बाबासाहेब आंबेडकर की प्रतिमाओं पर मालाएं चढ़ाते हैं, जबकि उनके इर्द-गिर्द खड़ा वैचारिक तंत्र उसी छुआछूत को दोहरा रहा है, जिसके विरुद्ध बाबासाहेब जीवन भर लड़ते रहे।
बहुत हो चुका यह पाखंड। बहुत हो चुकी यह गंदगी।
किसी दलित की उपस्थिति से कोई मंच अपवित्र नहीं होता। कोई मंदिर, गांव, कुआं, विद्यालय या यह देश अपवित्र नहीं होता। इन्हें अपवित्र करती है जातिवादी मानसिकता। जिसमें गंदे विचार पनप रहे होते हैं
आप हजारों लीटर पानी बहा सकते हैं, हजारों अग्नियां प्रज्वलित कर सकते हैं और जितने चाहें मंत्रों का जाप कर सकते हैं। लेकिन अपनी विचारधारा में समाई नफरत का शुद्धिकरण नहीं कर सकते। कोई भी अनुष्ठान उन लोगों की नैतिक सड़ांध को साफ नहीं कर सकता, जो आज भी किसी दूसरे मनुष्य की उपस्थिति को अपवित्र मानते हैं।
यह केवल खरगे जी का अपमान नहीं है। यह प्रत्येक दलित पर प्रहार है, बाबासाहेब के संविधान पर प्रहार है और भारत गणराज्य के माथे पर कलंक है।
प्रधानमंत्री मोदी को सार्वजनिक रूप से उत्तर देना होगा—क्या वह बिना किसी किंतु-परंतु के इस जातिवादी अश्लीलता की निंदा करते हैं या फिर अपने वैचारिक सिपाहियों की इस करतूत को उनकी स्वीकृति प्राप्त है?
भारत आंबेडकर के संविधान से चलेगा - आरएसएस की जातिवादी व्यवस्था से नहीं। देश में समानता होगी, छुआछूत नहीं। मानवता ही हमारी विचारधारा है, यह घिनौनी नफरत और भेदभाव नहीं। ऐसी निम्न मानसिकता का हमारे विविधतापूर्ण देश में कोई अस्तित्व नहीं हो सकता।
मंच को शुद्धिकरण की आवश्यकता नहीं थी।
शुद्धिकरण की आवश्यकता भाजपा और आरएसएस की जातिवादी राजनीति को ही क्यों है।
संवाददाता शमसुल हसन अंसारी

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