बागेश्वर बाबा के बयान से मचा सियासी भूचाल, संतों से नेताओं तक मचा घमासान!

 बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री एक बार फिर अपने बयान को लेकर देशभर में चर्चा के केंद्र में हैं। इस बार मामला किसी राजनीतिक दल, धर्मांतरण या हिंदुत्व की बहस का नहीं, बल्कि भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण की तुलना से जुड़ा है। मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के करैरा में रामकथा के दौरान दिया गया उनका एक बयान अब धार्मिक गलियारों से निकलकर सियासत के केंद्र तक पहुंच गया है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो, संत समाज की नाराजगी, विपक्षी नेताओं के हमले और माफी के बावजूद जारी विवाद ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर बागेश्वर बाबा के इस बयान में ऐसा क्या था कि देश की राजनीति में भूचाल आ गया?

आखिर क्या कहा था बागेश्वर बाबा ने?

दरअसल, 28-29 अक्टूबर के आसपास शिवपुरी के करैरा में आयोजित श्रीराम कथा के दौरान धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण की विशेषताओं का जिक्र कर रहे थे। इसी दौरान उन्होंने दोनों के स्वरूप और उनकी मुद्राओं की तुलना करते हुए कहा कि भगवान श्रीराम सीधे खड़े होते हैं, जबकि भगवान श्रीकृष्ण तीन जगह से टेढ़े होकर खड़े होते हैं। उन्होंने बांसुरी बजाने और धनुष चलाने को लेकर भी टिप्पणी की।

इतना ही नहीं, उन्होंने अयोध्या को सीधा और वृंदावन को टेढ़ा बताते हुए अपनी बात रखी। कथा का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होते ही कृष्ण भक्तों और ब्रज क्षेत्र के संतों ने कड़ी आपत्ति जताई। लोगों का कहना था कि भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण दोनों ही सनातन धर्म के आराध्य हैं। उनके बीच इस तरह की तुलना करना उचित नहीं है।

ब्रज के संतों ने खोला मोर्चा

इस बयान पर सबसे तीखी प्रतिक्रिया मथुरा और वृंदावन के संत समाज की ओर से देखने को मिली। कई संतों ने व्यासपीठ से इस तरह की टिप्पणी को अनुचित बताया। कुछ संतों ने धीरेंद्र शास्त्री से सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की मांग की। यहां तक कि उनके वृंदावन आने पर विरोध और बहिष्कार की चेतावनी भी सामने आई।

संतों का तर्क है कि भगवान राम और कृष्ण को एक-दूसरे से कमतर दिखाने का कोई औचित्य नहीं है। दोनों भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं और करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र हैं।

अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव ने भी उठाए सवाल

मामले ने उस समय राजनीतिक रंग ले लिया, जब विपक्षी नेताओं ने भी इस विवाद पर प्रतिक्रिया देनी शुरू कर दी।

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस मामले पर नाराजगी जताते हुए कहा कि पूज्य अवतारों के बीच नकारात्मक भाव से अपमानजनक तुलना किया जाना बेहद गंभीर विषय है। उन्होंने इसे सनातन समाज के बीच सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश से जोड़कर सवाल उठाए।

वहीं, बिहार के नेता तेजस्वी यादव ने भी भगवान श्रीकृष्ण को लेकर की गई टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने श्रीकृष्ण को लोकनायक और जन-जन का पूज्य बताते हुए ऐसी टिप्पणी को अशोभनीय और अमर्यादित करार दिया।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने भी धीरेंद्र शास्त्री पर निशाना साधा। उधर, सांसद पप्पू यादव ने इस मामले में एफआईआर दर्ज कराने की बात कही। इस तरह एक धार्मिक कथा का बयान राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा बन गया।

माफी मांगने के बाद भी क्यों नहीं थम रहा विवाद?

विवाद बढ़ता देख धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने वीडियो संदेश जारी कर अपनी सफाई दी और माफी मांगी। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण के बीच कोई भेद पैदा करना नहीं था। वह एक प्रचलित भक्तिपरक पद की व्याख्या कर रहे थे। उन्होंने खुद को भगवान श्रीकृष्ण और ब्रजभूमि का भक्त बताते हुए कहा कि उनकी बातों से किसी की भावनाएं आहत हुई हैं तो वह क्षमा चाहते हैं।

हालांकि, सवाल यह है कि जब माफी आ चुकी है, तब भी विवाद क्यों जारी है? इसकी एक बड़ी वजह यह है कि मामला केवल शब्दों का नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था और सार्वजनिक मंच से दिए जाने वाले बयानों की जिम्मेदारी का भी है।

बयान के बहाने सियासत का बड़ा खेल?

इस पूरे घटनाक्रम को केवल एक कथावाचक के बयान तक सीमित करके देखना शायद पूरी तस्वीर नहीं होगी। धार्मिक मुद्दे भारतीय राजनीति में लंबे समय से प्रभावशाली भूमिका निभाते रहे हैं। ऐसे में किसी बड़े धार्मिक चेहरे का बयान राजनीतिक दलों के लिए प्रतिक्रिया और अपनी विचारधारा रखने का अवसर बन जाता है।

यहां एक तरफ धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचने का सवाल है, तो दूसरी तरफ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कथावाचन की शैली पर बहस भी है। विपक्षी नेताओं की प्रतिक्रियाओं ने इसे राजनीतिक विमर्श में ला खड़ा किया है। हालांकि, किसी भी राजनीतिक दल के इरादों पर बिना प्रमाण निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

सबसे बड़ा सवाल: आस्था बड़ी या बयानबाजी?

बागेश्वर बाबा के इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि धार्मिक मंचों से बोलने वाले प्रभावशाली व्यक्तियों को अपनी भाषा और शब्दों के चयन में कितनी सावधानी बरतनी चाहिए। करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़े विषयों पर कही गई बात का असर केवल कथा पंडाल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों तक पहुंच जाता है।

फिलहाल धीरेंद्र शास्त्री माफी मांग चुके हैं, लेकिन राजनीतिक प्रतिक्रियाओं और संत समाज की नाराजगी ने विवाद को चर्चा में बनाए रखा है। अब देखना यह होगा कि उनकी सफाई से मामला शांत होता है या आने वाले दिनों में यह विवाद और बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनता है।

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