नेपाल में बालेन का 'बुलडोजर' एक्शन: 1594 राजनीतिक नियुक्तियां एक साथ खत्म
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने सत्ता संभालने के महज कुछ ही हफ्तों के भीतर देश के इतिहास का सबसे बड़ा प्रशासनिक फेरबदल किया है। एक ऐतिहासिक और कड़े फैसले में बालेन सरकार ने देशभर के विभिन्न सरकारी संस्थानों और सार्वजनिक निकायों में की गई 1594 राजनीतिक नियुक्तियों को तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दिया है।
प्रधानमंत्री बालेन शाह की कैबिनेट ने शुक्रवार को आठ अध्यादेशों को मंजूरी दी थी, जिन्हें राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने अपनी स्वीकृति दे दी है। राजपत्र में प्रकाशित होते ही यह अध्यादेश कानून बन गया, जिसके तहत पिछली सरकारों (ओली, देउबा और प्रचंड कार्यकाल) द्वारा की गई नियुक्तियों को एक झटके में शून्य घोषित कर दिया गया। बालेन सरकार के इस फैसले ने करीब 150 संस्थानों को सीधे तौर पर प्रभावित किया है। अध्यादेश के जरिए करीब 110 कानूनों में संशोधन किया गया है ताकि नियुक्तियों को हटाने में कोई कानूनी अड़चन न आए।
त्रिभुवन विश्वविद्यालय, संस्कृत विश्वविद्यालय और लुम्बिनी विश्वविद्यालय समेत देश के प्रमुख विश्वविद्यालयों के उपकुलपति (VC), रजिस्ट्रार और रेक्टर अब अपने पद पर नहीं रहे। नेपाल मेडिकल काउंसिल, नर्सिंग काउंसिल और प्रमुख सरकारी मेडिकल कॉलेजों के निदेशकों को पदमुक्त कर दिया गया है। नेपाल दूरसंचार प्राधिकरण, नागरिक उड्डयन प्राधिकरण, पर्यटन बोर्ड, प्रेस काउंसिल और गोरखापत्र संस्थान के शीर्ष अधिकारियों की छुट्टी हो गई है। माओवादी संघर्ष के बाद बनाए गए 'सत्य निरूपण आयोग' और 'बेपत्ता जांच आयोग' के पदाधिकारी भी इस फैसले की जद में आए हैं।
बालेन शाह, जो खुद एक इंजीनियर और रैपर से राजनेता बने हैं, शुरू से ही "योग्यता आधारित प्रणाली" (Meritocracy) के पक्षधर रहे हैं। सरकार का तर्क है कि राजनैतिक कोटा खत्म करना: सरकारी संस्थानों में केवल पार्टी समर्थकों को भरने की पुरानी परंपरा को खत्म करना अनिवार्य था। इन संस्थानों में विशेषज्ञों के बजाय राजनीतिक करीबियों को बिठाने से कामकाज में गिरावट और भ्रष्टाचार बढ़ा था। देश की व्यवस्था को नई गति देने के लिए संस्थानों को राजनीतिक जंजीरों से मुक्त करना जरूरी था।
प्रधानमंत्री बालेन शाह के इस कदम से पुरानी पार्टियों नेपाली कांग्रेस, CPN-UML और माओवादी केंद्र में खलबली मच गई है। जहाँ युवा और समर्थक इस फैसले को "नया नेपाल" बनाने की दिशा में क्रांतिकारी कदम बता रहे हैं, वहीं विपक्षी इसे "सत्ता का केंद्रीकरण" और "प्रतिशोध की राजनीति" करार दे रहे हैं।


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