बलिया में 12 पीढ़ियों से हिंदू परिवार रखता है ताजिया, मुस्लिमों के साथ सबसे आगे पहुंचता है कर्बला
बलिया : बलिया में एक साहू परिवार पिछले 10 से 12 पीढ़ियों से अपने घर में मुहर्रम का ताजिया रख रहा है. मुस्लिम समुदाय के लोग उनके घर पहुंचते हैं और सभी मिलकर ताजिया कर्बला तक ले जाते हैं. यह परंपरा आज भी गंगा-जमुनी तहजीब और आपसी भाईचारे की मिसाल बनी हुई है.
बलिया मुहर्रम सिर्फ गम, मातम और शहादत की याद का महीना ही नहीं है, बल्कि यह इंसानियत, आपसी सम्मान और भाईचारे की ऐसी मिसाल भी पेश करता है, जो भारत की गंगा-जमुनी तहजीब को मजबूत बनाती है. देश के कई राज्यों में मुहर्रम को न सिर्फ मुसलमान बल्कि हिंदू समुदाय के लोग भी पूरी अकीदत के साथ मनाते हैं.
उत्तर प्रदेश के बलिया में एक ऐसा ही परिवार है, जिसने मजहब से ऊपर उठकर सदियों पुरानी परंपरा को आज भी जिंदा रखा है. यहां एक हिंदू परिवार पिछले कई पीढ़ियों से अपने घर में ताजिया रखता है और मुहर्रम के जुलूस में मुस्लिम भाइयों के साथ कर्बला तक लेकर जाता है.
यह अनोखी परंपरा बलिया शहर के जगदीशपुर इलाके की है. परिवार के मुखिया शिवकुमार गुप्ता बताते हैं कि उनके घर में करीब 10 से 12 पीढ़ियों से लगातार ताजिया रखा जा रहा है. शिवकुमार गुप्ता के मुताबिक, यह सिलसिला करीब 100 से 150 साल पुराना है और आज भी उसी अकीदत और ऐहतराम के साथ निभाया जा रहा है.
शिवकुमार गुप्ता का कहना है कि मुहर्रम के दिनों में मुस्लिम समुदाय के लोग उनके घर आते हैं. इसके बाद हिंदू और मुस्लिम मिलकर ताजिया उठाते हैं और पूरे ऐहतराम के साथ कर्बला तक लेकर जाते हैं. इस संबंध में शिवकुमार गुप्ता ने बताया कि यह सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि दोनों समुदायों के बीच भरोसे और भाईचारे की निशानी बन चुकी है.
उन्होंने बताया कि एक समय ताजिया रखने को लेकर विवाद भी हुआ था. मामला अदालत तक पहुंचा, जिसके बाद हाई कोर्ट से उनके परिवार को ताजिया सबसे आगे रखने की इजाजत मिली. तब से उनका ताजिया मुस्लिम समुदाय के ताजियों के साथ सबसे आगे चलते हुए कर्बला तक पहुंचता है.
शिवकुमार गुप्ता बताते हैं कि उनका परिवार पूरी तरह हिंदू रीति-रिवाजों के मुताबिक जिंदगी बिताता है. इसके बावजूद उनके पूर्वजों की एक मन्नत से शुरू हुई यह परंपरा आज भी बिना रुके आगे बढ़ रही है. उनका कहना है कि परिवार की हर नई पीढ़ी इस जिम्मेदारी को उसी अकीदत के साथ निभाती है, जैसे उनके पूर्वज निभाते आए हैं.
शिवकुमार के मुताबिक, इस परंपरा का सबसे बड़ा संदेश यह है कि अकीदत अलग हो सकती है, लेकिन इंसानियत और आपसी सम्मान सबको जोड़ते हैं. बलिया का यह परिवार आज भी मुहर्रम के मौके पर यह साबित कर रहा है कि जब दिल मिलते हैं, तो मजहब दीवार नहीं बनता, बल्कि समाज में प्रेम, विश्वास और भाईचारे की नई मिसाल कायम होती है.
रिपोर्टर : विशाल साहू
No Previous Comments found.