स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हीरालाल सोनबोइर की जीवनी सहायक वाचन में शामिल
बालोद - स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व बालोद के पूर्व विधायक स्व. हीरालाल सोनबोइर की जीवनी को राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एससीईआरटी) ने कक्षा 4 के सहायक वाचन में शामिल किया है। बच्चे उनकी जीवनी पढ़कर देश के स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान को जान सकेंगे और देश प्रेम की भावना उनमें उत्पन्न होगी।
यह पूरे बालोद जिले के लिए गर्व की बात है कि राष्ट्रपति पुरस्कृत शिक्षक, पूर्व विधायक और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हीरालाल सोनबोइर की जीवनी को राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद ने बच्चों के लिए प्रेरक माना है। उनकी जीवनी को सत्र 2026-27 के सहायक वाचन कक्षा 4 के बच्चे पाठ क्रमांक 13 के पेज 21 में पढ़ सकेंगे। पाठ में बताया गया है कि महात्मा गांधी वर्ष 1933 में दुर्ग आए तो हीरालाल सोनबोइर उनका दर्शन करने दुर्ग गए। इसके बाद रायपुर में भी उनके कार्यक्रम में शामिल हुए। उन्होंने अपनी डायरी में लिखा है - ' यदि उस दिन दुर्ग नहीं जाता तो इस सदी में जन्म लेकर भी बापू के दर्शन से वंचित रह जाता।'
महात्मा गांधी से प्रेरित और प्रभावित होकर हीरालाल सोनबोइर ने अपने साथियों उमेद सिंह कलिहारी और छोटेलाल के साथ वर्ष 1930 में अर्जुंदा स्कूल में सेवारत रहने के दौरान जीवन भर खादी पहनने का संकल्प लिया था। वे स्कूल से छुट्टी के बाद आसपास के गांवों में रैली निकलवा कर अंग्रेजों के खिलाफ नारे लगवाते और गांव वालों से आजादी की लड़ाई में भाग लेने का आह्वान करते। वे स्कूल में शिक्षक रहने के दौरान डाकखाने का भी काम देखते थे । डाक के डिब्बे में अंग्रेजों के खिलाफ परचे को छिपा कर रखते थे और चुपके-चुपके इसे आसपास के गांवों में बंटवाते थे। जब अंग्रेज अफसरों को इसकी भनक लगी तो उनके खिलाफ जांच करने के लिए सीआईडी हवलदार को भेजा गया। पर्याप्त प्रमाण मिलने पर उन्हें बर्खास्त कर जेल में डाल दिया गया। पाठ में बताया गया है कि आजादी मिलने के दिन 15 अगस्त 1947 को वे डौंडीलोहारा में थे। तत्कालीन उपराष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने वर्ष 1961 में उन्हें उत्कृष्ट शिक्षक के रूप में सम्मानित किया। वे 60 वर्ष की उम्र में पहली बार वर्ष 1967 में बालोद विधानसभा के विधायक चुने गए। वे चार बार विधायक बने। 16 अप्रैल 1997 को उनका निधन हुआ।
रिपोर्टर - रमेश
No Previous Comments found.